रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextषोडशस्तरङ्गः ३६३ रखकर इसके नीचे अग्नि देकर पकायें। जब हिंगुल से पारद उड़ने तक की अवधि की अग्नि दे लें तो इसे स्वांगशीत करके खोल कर ऊपर हांडी में लगे हुए पारद को और नीचे हांडी में बनी हुई चाँदी की राख को अलग निकाल लें। इस विधि से तब तक बराबर ऊर्ध्वपातन यन्त्र में हिंगुल के साथ रजत को पकायें जब तक कि नीचे हांडी में रजत की कृष्णाभ अत्यन्त सुन्दर भस्म न हो जाय। ऊपर की हांडी में शुद्धपारद प्रतिवार ही प्राप्त होगा। इस प्रकार बनायी रजत को तत्तद् योगों में काम लावें॥ ३७-४०॥ सप्तमो मारणप्रकारः राजतानि विशुद्धानि पत्राणीह समाहरेत्। रसेश्वरं समं दत्त्वा पिष्टिकां कारयेत्ततः॥ ४१ ॥ गौरीपाषाणचूर्णञ्च समं निक्षिप्य मर्दयेत्। आतपे चाथ संशोष्य शुष्कचूर्णञ्च कारयेत् ॥४२॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटेन तु। पुटमेकं प्रदायाथ खल्वे सञ्चूर्णयेत्ततः ॥४३॥ हिंगुलं विमलञ्चैव तत्तुल्यं मेलयेद् बुधः। एवं पुटद्वयं दद्याद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥४४॥ एवं पुटत्रयेणैव रजतं मृतिमाप्नुयात्। एवं मृतन्तु रजतं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ४५ ॥ सप्तमः प्रकारः—शङ्खविषप्रयोगसाध्यः निर्माणसुगमश्चेति। अत्र भस्मावस्थायां शङ्खविषं नावशिष्यते इति समाधानीयम् ॥ ४१-४५ ॥ भा.टी.—शुद्धरजत के पत्रों का बुरादा और शुद्धपारद दोनों समभाग लेकर खरल में घोंटकर इसकी पिष्टी बना लें। पिष्टी बनाते समय ही इसमें समभाग गौरीपाषाणचूर्ण (संखिया) भी मिला दें। अब इसे धूप में अच्छी तरह सुखाकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को एक सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूंक दें। एक गजपुट की अग्नि देने पर सम्पुट में से द्रव्य को निकाल खरल में डालकर उसमें रजतसमभाग शुद्धहिंगुल मिला सम्पुट में बन्द करके पुनः गजपुट में फूँक दें। इसी प्रकार फिर तीसरी बार भी गजपुट में फूँक दें। इस तरह तीन पुटों ही में चाँदी की भस्म हो जाती है॥ ४१-४५॥ वक्तव्य—इस विधि में यद्यपि संखिया का मिश्रण किया गया है, परन्तु वह तीन गजपुटों की अग्नि देने पर उड़ जाता है। परन्तु संखिया के योग से