रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextषोडशस्तरङ्गः ३६६ क्षीरकाकोली तथा चोपचीनीचूर्णं और रससिन्दूर के साथ रजतभस्म सेवन कराने से ऋतुकाल में या किसी समय होनेवाले गर्भाशय के श्लैष्मिक कला- स्राव में जिसमें मासिकस्राव बड़ी कठिनाई के साथ होता हो तो, शीघ्र आराम आता है। शालपर्णी, कौंच के बीज, शतावर के चूर्ण के साथ रजतभस्म को दो मास तक निरन्तर सेवन करने से शरीर की कृशता नष्ट हो जाती है और शरीर बलवान् हो जाता है। वायविडंग, शुद्ध भिलावाफल, सोंठ तथा केशर- चूर्ण के साथ रजतभस्म को मिलाकर एक मास तक निरन्तर सेवन कराने से स्त्रियों के शरीर का सौन्दर्य बढ़ जाता है ॥ ५५-७५ ॥ वक्तव्य- टंकण अभ्रकभस्म तथा रससिन्दूरयुक्त रजतभस्म का प्रयोग गर्भाशयजन्य सब प्रकार की विकृतियों में लाभदायक है। इसके साथ यदि त्रिफलाक्वाथ की योनिवस्ति दी जाय तो यह और भी अधिक गुणकारी होता है। यह योग केवल वामडिम्बाशयजन्य पीड़ा और गर्भाशयभ्रंश में लाभदायक है। किन्तु दक्षिणडिम्बाशयजन्य वेदना सहित गर्भाशयच्युति में भी लाभदायक होता है। डिम्बाशयरोग के लक्षण अन्यत्र इस प्रकार पाये जाते हैं। "रमणा- तिशयाच्छैत्यादभिघाताद्विषादपि । अण्डाधारगदः कृच्छ्रो जायते चाहिताश- नात् ॥ उदरोरुव्यथा तीव्रा मूत्रस्याल्पत्वरक्तते । ज्वरारोचकहृल्लासा अरतिर्बल- संक्षयः॥ धमनी वेगिनि क्षुद्रा जिह्वा रक्तोत्पला तथा। अण्डाधारगदस्यैताः प्रोक्ता आकृतयो बुधैः ॥" अथ सोरकाम्लीयरजतस्य निर्माणप्रकारः सूचीवेध्यानि पत्राणि रजतस्य समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्माँस्तु राजतान् ॥ ७६ ॥ निधाय काचचषके विशुद्धं सोरकाम्लकम् । बिन्दुशो निक्षिपेत्तारं यावन्न द्रुतिमाप्नुयात् ॥ ७७ ॥ सोरकद्रावसम्पाते धूमोऽत्युग्रोऽभिजायते । अतो द्रावं क्षिपन् वक्त्रमन्यतः परिवर्तयेत् ॥ ७८ ॥ सताम्रं चेद्द्रवेत्तारं तदा नीलो भवेद् द्रवः । निर्मलं चेद्द्रवेत्तारं द्रवः शुक्लस्तदा भवेत् ॥ ७९ ॥ द्रवेऽस्मिन्नथ वै तीक्ष्णं लवणद्रावकं क्षिपेत् । यावत्तत्र किलाटाभं तारं विनिपतत्यधः ॥ ८० ॥