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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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सप्तदशस्तरङ्गः ४१६ द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारो निम्बूद्रवपेषणसूरणकन्दमध्यस्थापनसाध्यो गन्धक- सहभावी चेति ॥ ४०-४२ ॥ भा.टो.—अच्छी तरह बनायी हुई ताम्रभस्म एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर खरल में एकत्र करके नींबूरस से तीन घंटे अच्छी तरह घोटें। अब इसको गोला-सा बनाकर अच्छी तरह सुखा लें और जिमीकन्द के भीतर इस गोले को रखकर जिमीकन्द के बाहर अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके गजपुट की अग्नि में फूँक देवें। स्वांगशीत होने पर सावधानी से जिमीकन्द के भीतर से ताम्रभस्म के गोलक को बाहर निकाल खरल में पीसकर रख लें। रसशास्त्रज्ञों ने इस विधि से अमृतीकरण क्रियायुक्त ताम्रभस्म को पूर्वोक्त वमनादि अष्टदोष रहित अमृतसदृश गुणकारी माना है ॥ ४०-४२ ॥ तृतीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं सम्पेषयेद्वै स्वरसे कुमार्याः । विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पचेद् वराहाख्यपुटेऽश्ववारम् ॥४३॥ रीत्यानया वै ह्यमृतीकृतन्तु रविप्रियं शीलितमप्यमन्दम् । दोषाष्टकं नैव करोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥ ४४ ॥ तृतीयः प्रकारः—सूर्यसखस्य ताम्रस्य । अयं हि केवलकुमारीरससाध्यः । अत्रानुक्तोऽपि गन्धकः क्षेप्यः । अश्ववारं सप्तवारमत्र पुटनम् ॥ ४३, ४४ ॥ भा.टी.—विधिपूर्वक भस्म किये हुये ताम्रचूर्ण को खरल में डालकर कुमारीस्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस शुष्क- चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके वराहपुट दें। इस विधि से सात बार दुहराने से ताम्रभस्म अष्टदोष रहित हो जाती है। इसके सेवन से अष्टद सम्बन्धी किसी प्रकार की थोड़ी भी शंका नहीं रहती है ॥ ४३, ४४ ॥ मृतताम्रस्य गुणाः ताम्रं तिक्तं तुवरमधुरं पाकतश्चोष्णवीर्यं त्वम्लं स्निग्धं खलु विषहरं सारकं लेखनञ्च । पित्तोद्भूतानपि च कफजान् श्लेष्मपित्तोत्थितान् वा घोरान् रोगानपि हि विरजानप्यशेषांश्च हन्यात् ॥ ४५ ॥ अथ मृतताम्रगुणाः- पाकतश्चोष्णवीर्यमिति प्राचीनतन्त्रेषु तु “ताम्रं कषायं मधुरञ्च तिक्तमम्लञ्च पाके कटु सारकञ्च । पित्तापहं श्लेष्महरञ्च शीतं" इत्युक्तम् तत्र शीतत्वं लघीयस्यां मात्रायां प्रयोगात् अथवा स्पर्शतौ ज्ञेयम् ॥ ४५ ॥