रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
Page 455 of 799
Read in contextसप्तदशस्तरङ्गः ४२७ साथ कुछ दिन सेवन करने से श्वास तथा कास रोग में आराम आता है । प्रायः सब प्रकार के अर्श में ताम्रभस्म को नागकेसर तथा हरीतकीचूर्ण में मिला शहद के साथ चटाने से एक मास में आराम आ जाता है । तीव्र वमन को रोकने के लिए चौथाई रत्ती ताम्र को पीपलवृक्षत्वक्भस्म के साथ मिला जल से सेवन किया जाता है । पाँचों प्रकार की अन्नजा येमला आदि हिक्काओं को दूर करने के लिए ताम्रभस्म और स्वर्णमाक्षिकभस्म को बिजौरा नींबू के रस से सेवन कराया जाता है । नेत्रपटलगत रोगों को दूर करने के लिए केवल गन्धक योग से बनायी हुई ताम्रभस्म को अञ्जन के रूप में व्यवहार किया जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च पिप्पलीमूलचूर्ण के साथ मधु में मिलाकर एक सप्ताह तक सेवन करने से यकृद्दाल्युदर ( यकृतवृद्धि ) में शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला घी और शहद के साथ कुछ दिन चटाने से गुल्म विशेषतः अतीसार में आराम आता है । सन्निपात- ज्वर में जब लक्षण भयानक हो रहे हों तो ताम्रभस्म और शुद्ध वत्सनाभविष को समभाग में लेकर एकत्र खरल में धतूरे के स्वरस की सात भावना देकर सुखाकर रख लें । अब इसमें से आधी रत्ती से १ रत्ती मात्रा तक अदरक के रस से सेवन करायें । गुल्म रोग में ताम्रभस्म को पान के पत्ते में रखकर चबायें और अनुपान के रूप में अदरक का रस पिलायें तो गुल्म में आराम आता है । ताम्रभस्म को रससिन्दूर तथा कंटकारीफलचूर्ण में मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन करने से तीव्र वातिक कास ( Whopping cough ) जिससे खाँसते खाँसते शरीर में आक्षेप आने लगें और श्वासनिश्वास रुकने लगें तथा मुख नीला पड़ जाय उसमें शीघ्र आराम आता है । अतिदुर्धर्ष वमन को रोकने के लिए एक चावल भर ताम्रभस्म या मोरपंखभस्म को पीपल वृक्ष छाल की राख के जल से सेवन कराने पर शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पली, चित्रकमूल, पिप्पलीमूल, जटामांसी और भार्ङ्गीकषाय के साथ अथवा पिप्पल्यादिगण के कषाय के साथ सेवन से तीव्र हृदय शूल और आक्षेप ( Conveltion ) युक्त मक्कल शूल शीघ्र ही शान्त हो जाता है । ताम्रभस्म को स्वर्णभस्म तथा जटामांसीचूर्ण के साथ सेवन करने से अत्यन्त भयङ्कर आक्षेप जिसमें रोगी की दृढ़ मुष्टि ( मुट्ठी ) बँध जाती हो और मुखमण्डल नीला पड़ जाता हो,- खाने या पीने के समय गले में से घुरघुर शब्द होता हो, देर तक रहनेवाला अथवा थोड़ी देर रहनेवाला वेगयुक्त आक्षेप हो अथवा पैर तथा पेट में होनेवाली तीव्र रूप से खल्ली ( ऐंठन मांस- पेशियों की खिंचाहट ) हो, इन सब अवस्थाओंसे युक्त वात रोग में शीघ्र