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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 463 of 799

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Page 463

अष्टादशस्तरङ्गः ४३५ अथ वङ्गविज्ञानीयोऽष्टादशस्तरङ्गः अथ वङ्गस्य नामानि वङ्गञ्च वङ्गकं रङ्गं रङ्गकं शुक्लोहकम् । कुरूप्यं त्रपुसञ्चैव त्रपुष त्रपु कीर्तितम् ॥ १॥ अथ वङ्गवर्णनम्—वङ्गनामानि तन्त्रव्यवहारविषयाणि ॥१॥ भा.टी.—वंग, वंगक, रंग, रंगक, शुक्लोह, कुरूप्य, त्रपुस, त्रपुष, त्रपु, ये सब नाम रांगा कली के कहे जाते हैं ॥ १ ॥ वक्तव्य—वंग या कली चांदी के समान श्वेत चमकीली धातु है । पर यशद की अपेक्षा मृदु और सीसक की अपेक्षा कुछ कठोर होती है। वंग २३३ शतांश की गर्मी पर पिघलने लगता है और २२७० शतांश पर बाष्प बनकर उड़ने लगता है । इसका आपेक्षिक गुरुत्व ( Atomic Weight ) 118-7 है। यह बात कई बार वैद्यों के देखने में आयी होगी कि हरताल आदि के साथ वंग को गजपुट में फूँकने से उसमें कुछ भी नहीं मिलता है । यद्यपि वंग सायबेगि बालविया में न्यूनाधिक तौर पर शुद्ध रूप में भी प्राप्त होता है, परन्तु अधिकांश में यह यौगिक रूप में ही पाया जाता है यह नैसर्गिक रूप में ओषजन से मिला हुआ पत्थरों (जिनमें गन्धक, संखिया, लौह, ताम्र आदि की अशुद्धियां होती हैं) के रूप में मिलता है । इन पत्थरों को चारकोल के साथ गरम करके वंग पृथक् किया जाता है । वङ्गस्य द्वैविध्यम् खुरकं मिश्रकं चेति वङ्गक द्विविधं मतम् । खुरकं श्रेष्ठमाख्यातं मिश्रकंत्ववरं परोक्तम् ॥ २ ॥ खुरकं मिश्रकञ्चेति द्विविधं वङ्गम् , तयोः खुरकं श्रेष्ठं निर्मलत्वात् ॥२॥ भा.टी.—खुरक और मिश्रक भेद से वंग दो प्रकार का होता है। इनमें से “खुरक” संज्ञक वंग श्रेष्ठ और मिश्रक वंग अवर ( निकम्मा ) माना जाता है ॥ २ ॥ मृदुलं निर्मलञ्चैव चन्द्रलोहसमप्रभम् । द्रुतद्रावञ्च निःशब्दं खुरकं समुदीरितम् ॥ ३ ॥ खुरकलक्षणमुपादेयतारतम्यकारणम्—चन्द्रलोहसमप्रभं रजतसदृशम्, निः शब्दं गालने समुदीरितं प्राचीनैरिति शेषः ॥ ३ ॥