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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 476 of 799

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Page 476

४५० रस्तरङ्गिणी ल्यार्थम् । ईश्वरसंमितं पारदपरिमाणम् । चुल्लिकालवणं नवसादरम् । उक्तञ्चा- न्यत्रापि—"प्रक्षिपेद् भाजने वंगमायसे वापिमृण्मये । विद्रुते वह्नितापेन तस्मिन् तन्मानकं रसम् ॥ क्षिप्त्वा सञ्चूर्णयैत्तत्र नरसारञ्च गन्धकम् ।” इत्यादिना । गन्धकमत्र निःस्नेहं ग्राह्यम् । केचित्तु वालुकायन्त्रं विहाय अङ्गारधानिकायामेव पाच्यन्ति, तत्तु वर्णगुणाभ्यां हीनमिति विभावनीयम् ॥ ६८–७६ ॥ भा.टी.--तीन कर्ष परिमाण शुद्ध खुरक वंग को एक लोहे की करछी में डालकर करछी को अग्नि में तपायें, जब वंग पिघल जाय तो उसमें वंग के बराबर भाग शुद्धपारद डालकर शीघ्र ही करछी अग्नि से उतारकर खरल में उलट दें और शीघ्र ही इस वंगपारद के मिश्रण को मूसली से घोटना शुरू कर दें जिससे वह पीठी-सी हो जाय। अब इसमें कोई अम्लद्रव डालकर मर्दन करें। कुछ काल अम्ल में मर्दन करने के बाद उसमें सैन्धानमकचूर्ण मिलाकर मर्दन करके जल से अच्छी तरह धो डालें । अब इसमें पारद के समभाग शुद्ध गन्धक और नौसादर मिला कर खूब रगड़ते हुए बारीक चूर्ण (कजलीसा ) बना लें । अब इस चूर्ण को रससिन्दूर बनानेवाली काँच की शीशी में कपड़- मिट्टी करके भर दें और इस शीशी को वालुकायन्त्र में रखकर चार पहर की अग्नि में पकायें, अग्नि देते हुए जब शीशी के मुख से धुँआ निकलना बन्द हो जाय तो शीशी को सावधानी से ०एक संडसी से पकड़कर नीचे उतारकर ठंडा कर लें । ठंडा होने के बाद शीशी को निकाल डालें तो शीशी के तल- भाग में से स्वर्ण के समानवर्ण के स्वर्णवंग को निकाल लें । विचारशील वैद्य- को शीशी तोड़ते समय होनेवाले शीशी के टूटे हुए कणों को अच्छी तरह देख कर अलग कर देना चाहिये । इस विधि से बनाया हुआ वंग, स्वर्णकणों से जैसा व्याप्त रहता है, अतः इसको रसायनाचार्य लोगों ने स्वर्णवंग नाम से . व्यवहार में लिया है ॥ ६८–७६ ॥ वक्तव्य—स्वर्णवंग बनाते समय वंग को करछी में पिघलाकर खरल में पड़े हुए पारद में डालकर तत्काल मर्दन करने से सुभीता रहता है । अन्यथा ऊपर करछी में ही वंग डालने से कई बार पारा उड़ जाता है या छटककर नीचे गिर जाता है । वालुकायन्त्र में पकाते हुए धुँए के साथ नौसादर भी उड़ता है जिससे शीशी का मुख बन्द हो जाता है और धुँआ निकलता हुआ नहीं दिखाई देता । अतः रससिन्दूर की भाँति कभी-कभी शीशी के गले को एक गरम लोहे की सींक से साफ करते रहना चाहिए ।