रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context४५४ रसतरङ्गिणी कराना व्रणमेह की अचूक औषधि है। नूतन उग्रवेग व्रणमेह को नष्ट करने के लिये स्वर्णवंग को श्वेतसारिवा (अनन्तमूल) के शीत कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र लाभ होता है। रात्रिमेह (स्वप्नदोष) को दूर करने के लिये स्वर्ण वंग को शीतलचीनीचूर्ण के साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये। शरीर में बल और वीर्यशक्ति बढ़ाने के लिये स्वर्णवंग को छोटे सेमर की जड़ के चूर्ण के साथ कुछ दिन सेवन कराना चाहिये। स्वर्णवंग को यशदभस्म में मिलाकर शहद के साथ पथ्य पूर्वक एक मास तक नियम पूर्वक सेवन करने से शुक्रतारल्य (वीर्य का पतला होना) नष्ट होकर शरीर में अत्यन्त बलवृद्धि होती है। शुक्र की दुर्बलता (अल्प-परिमाण होना, गठीला दुर्गन्धित आदि दोष युक्त होने से सन्तानोत्पादन में असमर्थता) को दूर करने के लिये स्वर्णवंग एक रत्ती, रससिन्दूर एक रत्ती; दोनों को एकत्र पीसकर इसको शहद के साथ सुबह चाटें और इसी तरह शाम को एक मास तक चाटने से और पथ्य पूर्वक रहने से शुक्र की दुर्बलता शीघ्र ही दूर हो जाती है ॥८४-६५॥ अथ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम् सुवर्णवंगमुज्ज्वलं तु तोलकद्वयोन्मितम् । विशोधितं शिलामयं सुवर्णवंगसंमितम् ॥ ६६ ॥ मृतं तु तीक्ष्णलोहकं शिलामयार्द्धभागिकम् । सुशोभनं तथाभ्रकं मतं तु तोलकार्द्धकम् ॥ ६७ ॥ स्मरध्वजाङ्कपूर्वकं ध्वजाह्वयं तथा रसम् । विमर्द्य खल्वके भृशं वटीं त्रिगुञ्जसंमिताम् ॥ ६८ ॥ विधाय काचकूपके न्यसेत्ततो भिषग्वरः । यथानुपानयोगतो द्विवारमेकवासरे ॥ ६९ ॥ प्रयोजयेद्विशेषविद्वलाबलाचपेक्षया । रसायनं मतं त्विदं सुवर्णवंगपञ्चकम् ॥ १०० ॥ वंगीयैः श्रीरमानाथसेनवैद्यमहोदयैः । विचार्याविष्कृतमिदं सुरम्यन्तु रसायनम् ॥ १०१ ! प्रकाशितं खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया । अमोघास्त्रमिदं ख्यातं शुक्रमेहस्य नाशने ॥ १०२ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं परं बुद्धिविवर्द्धनम् । समाख्यातं विशेषेण शुक्रतारल्यनाशनम् ॥ १०३ ।: