Skip to content
BharatKosha
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 493 of 799

Read in context
Page 493

एकानविंशस्तरङ्गः ४६७ भा.टी.—एक रत्ती उत्तम सीसकभस्म में हरिद्राचूर्ण और आमलों का चूर्ण दो रत्ती मिलाकर शहद के साथ चटाने से बहुत शीघ्र प्रमेह रोग में आराम आता है । सीसकभस्म को अशोकत्वक्‌कषाय के साथ कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही पुरातन रक्तप्रदर रोग में आराम आ जाता है । एक रत्ती सीसकभस्म में ४ रत्ती नागकेसरचूर्ण मिला सेवन करने से रक्तार्श रोग नष्ट हो जाता है । गुडूचीसत्त्व में सीसकभस्म मिलाकर शहद के साथ चाटने से कुछ दिनों में वात- प्रकोपजन्य प्रमेह रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । सीसकभस्म में स्वर्णभस्म, रससिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन करने से आन्त्रशोथ (आन्त्रक्षय) में शीघ्र ही आराम आता है । वृक्कों में शोथ के कारण उत्पन्न विष द्वारा होनेवाले आक्षेप में सीसकभस्म का कौंच के बीज, बलामूल तथा जटामांसी कषाय के साथ सेवन करने से अवश्य आराम आता है । सर्वांग में कम्पन के साथ उत्पन्न होनेवाले पक्षाघात (लकवा) में सीसकभस्म को रस- सिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । प्रसारिणी बला (करैंटी), रास्ना और कौंच के बीज या मूल के कषाय अनुपान से सीसक- भस्म में रजत तथा यशदभस्म मिलाकर सेवन करने से हस्तपाद आदि अंगों की प्रसारक मांसपेशीगत विकार के कारण उत्पन्न भयानक पक्षाघात में विशेषरूप से आराम आता है ॥ ४७-५५ ॥ अन्त्रशोषान्तकरः शिलया निहतं सीसं तोलकद्वयसंमितम् । कान्तपाषाणमसितं सीसकप्रमितं शुभम् ॥ ५६ ॥ निश्चन्द्रिकं सुवर्णं तु तथा यशदकारणम् । गगनं रविलोहं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ५७ ॥ सर्वार्द्धं गन्धकं दत्त्वा पेषयेत्कन्यकाम्भसा । त्रिधा वराहाख्यपुटे पुटयेद्भिषजां वरः ॥ ५८ ॥ खल्वे सञ्चूर्ण्य च ततः काचकूप्यां तु विन्यसेत् । समाख्यातो रसोऽयं तु ह्यन्त्रशोषान्तकाभिधः ॥ ५९ ॥ श्रीमद्भिर्गुरुवर्यैस्तु ह्ययमाविष्कृतो रसः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ६० ॥ अन्त्रशोषान्तकरसो नवाविष्कृतः—यशदकारणं खर्परम् । रविलोहं ताम्रम् निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५६-६० ॥