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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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मूषा आदि बनाने की सामग्री भी रखनी चाहिये, पत्थर और लोहे के गोल और किश्तीनुमा खरल और उनकी मूसली और अनेक प्रकार के काँच, मिट्टी, लकड़ी, लोहादि धातुओं के बने हुए सँड़सी, कैंची, सूप, ऊखल, चलनी, मूषा और दोलायन्त्र आदि यन्त्रों को बनाने की सामग्री और बने हुए रस भस्म आदि को रखने के लिए मजबूत और डाटवाली काँच की शीशी। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के धातुओं के बने हुए छोटे बड़े तराजू या काँटे, रसौषधि-वितरण करने के लिए पतले सफेद और बारीक चिकने कागज, जंगली उपलें, लकड़ी, भूसी, फूस, बुझे और अनबुझे कोयले। इसके अति- रिक्त देश काल आदि के अनुसार और भी जो जो उपयोगी चीजें हों उनका भी रसशाला में संग्रह करना चाहिये। इस प्रकार सब सामग्री से परिपूर्ण हुई रसशाला को प्रतिदिन सेवकों द्वारा झाड़ना-बुहारना चाहिए, जिसमें उससे अशुद्ध वायु धूल आदि द्वारा औषधियों में खराबी न आ जाय ॥१८-२७॥ वक्तव्य—उक्त रसशाला में प्रधान रूप से निम्न उपकरण भी होने चाहिये। पारद, उपरस, शंख, शुक्ति आदि जान्तवपदार्थ, विशिष्ट क्षार, सब प्रकार के नमक, जौ, अपामार्ग, पलाश, थोहर, इमली, तिल आदि से प्राप्त होनेवाले क्षार स्वर्ण आदि धातु-उपधातु, मिश्रलोह, महारत्न, क्षुद्ररत्न, विष, उपविष और भिन्न-भिन्न धातु आदि के शोधन-मारण में काम आनेवाली औषधियाँ तथा सुराप्रदीप कांच के प्याले, दृढ़ काँच की नलियाँ, सीसे के पात्र, सारक पत्र, वर्णपत्र, इसके अतिरिक्त गंधकद्राव को रखने के लिए मज- बूत काँच के डाटवाली नीलवर्ण काँच की शीशियाँ और कस्तूरी आदि सुगन्धित औषधियों के रखने के लिए काँच के डाटवाली सुन्दर शीशियाँ और छपे हुए या हाथ से लिखे हुए भिन्न-भिन्न औषधि नाम के लेबल होने चाहिये। गन्धकद्राव तथा विषैली औषधियों के लेबल विशेषरूप से लाल वर्ण के होने चाहिए जिससे इनको सावधानी से प्रयोग किया जाय, भिन्न-भिन्न रसौ- षधियों को शीशियों में भरकर उनके ऊपर अच्छी तरह लेबल लगा देना चाहिए। इसके अतिरिक्त रोगियों के घर जाकर देखनेवाले वैद्यों के लिए सुन्दर और रसौषधियों से भरी हुई शीशियों से युक्त एक करभेषजपेटिका होनी चाहिये। परिचारकलक्षणम् सोद्यमाः सत्यवक्तारो निर्लोभाः शुचयः परम्। शूराः पथ्याशिनो ग्राह्याः भिषग्भिः परिचारकाः ॥२८॥