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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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४७४ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—खर्पर ( खपरिया ) जो यशद का कार्बोनेत् ( Zinc carbo- nate ) होता है, स्वभावतः खानों से प्राप्त होता है। इसमें से यशद प्राप्त करने के लिए खर्पर को जल और तैलों के घोलों में अच्छी तरह मिला दिया जाता है जिससे मिट्टी और पत्थर नीचे बैठ जाते हैं और धात्वीय तेल के साथ ऊपर के भाग में आ जाता है। फिर इसे भूनने से यशदओषित् बन जाता है। इस यशदओषित् को चारकोल के साथ ऊर्ध्वपातन यन्त्र में डाल १३०० डिग्री का ताप देने से यशद ऊर्ध्वपातित होकर जम जाता है। स्वरूप—यशद एक नीली श्वेत सी धातु है। १०० से १५० डिग्री तक गरम करने से वह मृदु और चमकीली हो जाती है तब इनके पत्र बनाये जा सकते हैं। २०० डिग्री के ताप पर फिर यह भंगुर हो जाता है। जिससे फिर इसका चूर्ण कर सकते हैं। ४०६ डिग्री के ताप पर यशद पिघलने लगती है और ४१६ डिग्री ताप पर उबलने लगती है। खुली हवा में गरम करने से यह चमकीली नीली ज्वाला से जलती और श्वेत चूर्ण के रूप में हो जाती है, यही यशद का ओषित् होता है। इसे ताम्र के साथ मिला पित्तल नामक धातु बनायी जाती है। ग्राह्ययशदस्य स्वरूपम् छेदे समुज्ज्वलं स्निग्धं मृदुलं निर्मलं तथा। द्रुतद्रावं महाभारं यशदं ग्राह्यमुच्यते ॥ ६५ ॥ महाभारं भारवत्तरम्, मूर्त्तिलघुत्वेऽपि बहुभारमित्यर्थः ॥ ६५ ॥ भा.टी.—जो यशद काटने पर चमकीली चिकनी दिखती हो, मोड़ने में कोमल और साफ हो, अग्नि में शीघ्र ही पिघल जाती और गुरुभार युक्त हो तो उसे उत्तम यशद समझना चाहिये ॥ ६५ ॥ अग्राह्ययशदस्य स्वरूपम् कठिनं कठिनद्रावं रूक्षं रूक्षप्रभं लघु। मलिनं यशदं यत्तु तदग्राह्यं प्रकीर्तितम् ॥ ६६ ॥ भा.टी. —मोड़ने में कठिन, अग्नि में देर से पिघलनेवाला, बाहर से रूक्ष तथा खुश्क चमकवाला, लघुभार, मैला यशद औषधि कार्य के लिये अग्राह्य समझना चाहिये ॥ ६६ ॥ अथं यशदशोधनस्य प्रयोजनम् विशुद्धिहीनं यशदं मृतञ्चेद् विशोधितं वाप्यमृतं त्वविज्ञैः। निषेवितं वै जनयेद् विकारान् गुल्मप्रमेह क्षयकुष्ठकादीन् ॥ ६७ ॥

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