रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextयद्वा एकविंशतिधा गोदुग्धेन निर्वापणात् ॥ १०२ ॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघला कर गाय के दूध में इक्कीस बार बुझाने से भी यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १०२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः प्रद्राव्य यशदं वैद्यः सुधादुग्धे निषेचयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १०३ ॥ स्नुहीदुग्धे सप्तधा निर्वापणात् । प्राचीनैस्तु यशदशोधनमारणं वङ्गस्येवेति परिभाषितम् । तन्तु विस्तरप्रियैराचार्यैर्नादृतम् । अनुभूतं निर्णीतञ्चेति ॥१०३॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघलाकर थोहर के दूध में सात बार बुझा देने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १०३ ॥ अथ यशदस्य प्रथमो मारणप्रकारः शुद्धं यशदमादाय कटाहे तीव्रवह्निना । प्रद्राव्य भिषजां वर्यः समपारदगर्भके ॥ १०४ ॥ खल्वे विनििक्षिपेद्यत्नात्ततः सम्पेपयेद् द्रुतम् । पिष्टिं विधाय यत्नेन क्षालयेन्निम्बुवारिणा ॥ १०५ ॥ यशदप्रमितं गन्धं दत्त्वा सञ्चूर्णयेत्ततः । शरावसम्पुटस्थन्तु पुटयेदथ यत्नतः ॥ १०६ ॥ रीत्यानया तु यशदं मृतिमायात्यनुत्तमाम् । इत्थं मृतन्तु यशदं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १०७ ॥ अथास्य मारणप्रकारः प्रथमः सूतगन्धकयोगजातः । निम्बुवारिभिः क्षालनं पिष्टिनैर्मल्यार्थम् । व्याख्यातप्रायपाठमन्यत् ॥ १०४-१०७ ॥ भा.टी.—शुद्ध यशद को एक लोहे की कड़ाही में डाल चूल्हे पर तीव्र अग्नि से पिघलायें। जब पिघल जाय तो इसमें समभाग शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही नीचे उतार खरल में डालें और तुरन्त ही मूसली से खूब रगड़कर इसकी पीठी बना लें। अब इस पिष्टी को नींबू के स्वरस से घोंटकर अच्छी तरह धो डालें । अब इस पिष्टी में यशद के समभाग शुद्ध गन्धक मिला अच्छी तरह घोटकर चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें। इस प्रकार यशद को पुट देने से उसकी उत्तम भस्म बन जाती है ॥ १०४-१०७ ॥