रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६२६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल, काल आदि का विचार करके गोमेद भस्म की चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा तक में सेवन करना चाहिए ॥ १२७ ॥ अथ प्रवालस्य नामानि प्रवालकं प्रवालश्च भौमरत्नञ्च विद्रुमम् । अब्धिजन्तुविशेषोत्थं तदेव परिकीर्तितम् ॥ १२८ ॥ भा.टी.—प्रवालक, प्रवाल, भौमरत्न, विद्रुम, अब्धिजन्तुविशेषोत्थ, ये सब नाम प्रवाल मूंगा (Red Coral Bead) के कहे जाते हैं ॥ १२८ ॥ ग्राह्यविद्रुमस्य स्वरूपम् आरक्तमञ्जुलच्छायं स्निग्धं वृत्तञ्च निर्व्रणम् । दीर्घंस्थूलं गुरु दृढं ग्राह्यं विद्रुममुच्यते ॥ १२६ ॥ अथ विद्रुमपरिचयः—आरक्तमञ्जुलच्छायमिति ग्राह्यप्रवालरूपम् । उक्तं हि “पक्वबिम्बफलच्छायं वृत्तायतमवक्रकम् । स्निग्धमव्रणकं स्थूलं प्रवालं सप्तधा शुभम्” इति ॥ ११६ ॥ भा.टी.—गूढ रक्तवर्ण की कान्तिवाला अर्थात् रक्तवर्णकी, स्निग्ध और गोलाकार; लम्बी मोटी शाखायुक्त, व्रण ( गढा छिद्र ) रहित, गुरुभार तथा दृढ़ ( मजबूत ) प्रवाल उत्तम ( ग्राह्य ) माना जाता है ॥ १२६ ॥ वक्तव्य—आजकल प्रवाल के दो भाग प्रयोग में लाये जा रहे हैं १— शाखा प्रवाल । २—प्रवाल । शाखा प्रवाल ही उत्तम प्रवाल मानी जाती है । यह लम्बी-लम्बी शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होती है, इसके बीच में कोई छिद्र नहीं होता है । तोड़ने में बहुत मजबूत और भीतर से भी बाह्य रंग से युक्त होती है । कई माला बेचनेवाले मूंगा की माला कह करके भी मूंगा बेचा करते हैं, परन्तु कई बार यह कृत्रिम मसाले का मूंगा पाया गया है। इन दोनों को जलती हुई आग में जलायें तो ये बत्ती की भाँति जलने लगते हैं । अतः यदि माला- वाली मूंगा लेना हो तो उसे तोड़कर और आग में जलाकर परीक्षा कर लेनी चाहिए । मूलप्रवाल प्रायः अनेक गोल-गोल छिद्रयुक्त स्पञ्ज की भाँति का पत्थर सा होता है । इसके छिद्रों में मिट्टी, कङ्कड़, बालू-रेत भरी हुई होती है। यह मूल- प्रवाल शाखाप्रवाल की अपेक्षा अल्पगुण और अधिक क्षारीय होता है। रसरत्न- समुच्चय में उत्तम शाखाप्रवाल की इस प्रकार परीक्षा लिखी है—“पक्वबिम्बी- फलच्छायं वृत्तायतमवक्रकम् । स्निग्धमव्रणकं स्थूलं प्रवालं सप्तधा शुभम्” ॥