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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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६३० रसतन्त्रसार शारीरिक भार कम हो रहा हो तो प्रवालपिष्टी से शीघ्र लाभ दिखाई देता है । ज्वर की अधिकता और निरन्तरता, शुष्ककास, श्वास, पार्श्वशूल (फुप्फुस व्यथा) आदि लक्षणयुक्त यक्ष्मा में प्रवालपिष्टी को शृंगभस्म तथा सतगिलोय के साथ देने से अच्छा लाभ होता है । परन्तु सब लक्षण युक्त यक्ष्मा, तीव्रज्वर, तीव्र- कास, रक्तनिष्ठीवन, दुर्गन्धित कफनिष्ठीवन, सर्वांग स्वेद, प्रातःकालीन स्वेद, तृषा, ओजोनाश, अति क्षीणता आदि में प्रवाल को सुवर्णभस्म और गुडूचीसत्व के साथ देना लाभदायक होता है रक्त की द्रवता और वृद्धि में प्रवाल शीघ्र गुण करता है । अतएव इसे तीव्र रक्तार्श, रक्तपित्त (नकसीर आदि) Haemo- philia रोगों में इसके प्रयोग से रक्त में घनत्व बढ़ जाता है । वह पुष्ट भी हो जाता है । गर्भावस्था में होनेवाले पाण्डु तथा अन्यान्य रोगों में प्रायः प्रवालपिष्टी बहुत उत्तम लाभदायक है । जिन माताओं की सन्तान सूखोरोगग्रस्त होकर मर जाया करती है उसको गर्भावस्था में प्रवाल का सेवन कराना अत्यन्त लाभदा- यक सिद्ध हुआ है । जिन स्त्रियों में दूध पिलाने के कारण दुर्बलता अधिक बढ़ जाती है उनके लिए प्रवाल उत्तम औषधि है । जिन बालकों की गलग्रन्थि (Toncile) बढ़ जाती है और कान पकते रहते हैं और सदा प्रतिश्याय बना रहता है उनके लिए भी प्रवाल ग्राही और पोषक होने से लाभदायक सिद्ध हुआ है। मृतविद्रुमस्य मात्रा गुञ्जार्धतः समारभ्य गुंजाद्वयमितं परम् । विद्रुमं विनियुंजीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १४२ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल, अवस्था तथा काल आदि पूर्ण विचार करके आधी रत्ती से लेकर दो रत्ती की मात्रा तक प्रवालभस्म का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४२ ॥ अथ विद्रुमस्य आमयिकः प्रयोगः तण्डुलोदकयोगेन प्रवालं रक्तिकाद्वयम् । शीलितं विनिहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रं कफोत्थितम् ॥ १४३ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं प्रवालं गुञ्जसंमितम् । कट्वीद्राक्षाभयायुक्तं विड्विघातं निहन्त्यलम् ॥१४४॥ प्रवालं सुमृतं गुञ्जं रससिन्दूरसंयुतम् । गोक्षुरस्य कषायेण शीलितं मूत्रसादहृत् ॥ १४५ ॥