BharatKosha
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 668 of 799

Read in context
Page 668

त्रयोविंशस्तरङ्गः ६४३ बन्द करके अच्छी तरह सन्धिलेप करके सुखा लें । अन्त में गजपुट में फूँक देवें। इस विधि से अच्छी तरह आठ बार गजपुट में फूँक देने से लाजवर्द की निश्चित भस्म हो जाता है ॥ १६६-१६८ ॥ मृतराजावर्तस्य गुणाः नृपोपलः कटुस्तिक्तो दीपनः पाचनस्तथा । शिशिरः पित्तशमनो बृंहणोऽतिरसायनः ॥ १६६ ॥ पाण्डुप्रमेहहरणः क्षयशोषणिबर्हणः । मदात्ययात्ययकरश्छर्दिहिक्कानिवारणः ॥ २०० ॥ मृतश्चायं कटुतिक्तादिगुणः । अन्यत्राप्युक्तं—"राजावर्तः कटुः स्निग्धः शिशिरः पित्तनाशनः ।” इति ॥ १६६, २०० ॥ भा.टी.—राजावर्त कटु और तिक्तरस, दीपक और पाचक तथा शिशिर गुण, युक्त होता है। इसके सेवन से पित्तप्रकोप शान्त होता है और शरीर में मांसादि धातुओं की वृद्धि होने से मोटापा आता है और जरा-व्याधि का नाश होता है। यह पाण्डुरोग तथा प्रमेह, क्षय और शोष रोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से पुरातन मदात्ययरोगजन्य उपद्रव शान्त हो जाते हैं और वमन तथा हिक्का रोग नष्ट होते हैं ॥ १६६, २०० ॥ मृतराजावर्तस्य आमयिकः प्रयोगः नृपोपलः सममृततारताप्यसमन्वितः । विपक्वो गव्यहविषा सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ २०१ ॥ निषेवितो निहन्त्याशु सर्वानैव मदात्ययान् । रससिन्दूरताम्राढ्यः सुमृतस्तु नृपोपलः ॥ २०२ ॥ यष्टीमधुकचूर्णेन सितामध्वाज्यसंयुतः । निषेवितो निहन्त्याशु सर्वानैवमदात्ययान् ॥ २०३ ॥ मृताभ्रसत्त्वकान्ताभ्यां सुमृतस्तु नृपोपलः । मधुना शीलितं हन्ति प्रमेहादिकमुल्बणम् ॥ २०४ ॥ भा.टी.—लाजवर्द की भस्म में समभाग रजतभस्म और स्वर्णमाक्षिक भस्म मिलाकर गोघृत में अच्छी तरह पका लें। अब इस चूर्ण में खांड, शहद और गोघृत मिलाकर उचित मात्रा में सेवन कराने से सब प्रकार के मदात्यय रोग और उपद्रव नष्ट हो जाते हैं। इसी तरह लाजवर्द भस्म में रससिन्दूर, ताम्रभस्म और मुलेठी चूर्ण मिलाकर इसको उचित मात्रा में लेकर खांड शहद