रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextधत्तूरबीजं विजया गुञ्जा भल्लातकाह्वयः ॥१६३॥ अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लाङ्गली करवीरकम् । समाख्यातो गणोऽयं तु बुधैरुपविषाभिधः ॥१६४॥ अथ क्रमप्राप्तोपविषनिरूपणे प्रथमत उपविषाणां नामतः कीर्तनम्—विष- तिन्दुकबीजमित्यादि । रेचकं जयपालः ॥१६३, १६४॥ भा.टी.—कुचलाबीज, अफीम, जमालघोटाबीज, धतूराबीज भांग की पत्ती, सफेदरत्ती, भिलावा, आक का दूध, थोहर का दूध, कलिहारी, कनेरजड़ की छाल, इन सब को वैद्य लोग उपविष गण कहते हैं ॥१६३, १६४॥ वक्तव्य—यद्यपि कुचला, अफीम, धतूरा, जमालघोटा और भांग विशेष विष हैं और आजकल इन्हीं विषों की घटना देखने को मिलती है, परन्तु ये विष कालकूट, शृंगिक, ब्रह्मपुत्र आदि विषों की अपेक्षा अल्पशक्तिवाले होने से उपविषों में गिने गये हैं । तन्त्रान्तर में कहीं सात उपविष माने गये हैं, जैसे “अर्कक्षीरं स्नुहीक्षीरं लांगली करवीरकः । गुञ्जाऽहिफेनधत्तूराः सप्तोपविषजातयः और कहीं “अर्कस्नुग् लांगली गुञ्जा हयारिविषमुष्टयः । धूर्तोऽहिफेनं जैपालो नवोपविषजातयः ॥” इस प्रकार नौ ही उपविष माने गये हैं । भिलावा और कुचला को उपविष नहीं माना है, परंतु आजकल कुचला महाविषोंमें गिना जाता है । अथ विषतिन्दुकस्य नामानि कुचेलकं कुचेलञ्च कुचिला कुचिलं तथा । विषतिन्दुस्तथा तिन्दुस्तिन्दुकं विषतिन्दुकम् ॥१६५॥ कारस्करो रम्यफलः कुपाको विषमुष्टिका । विषमुष्टिः कालकूटस्तदेव विनिगद्यते ॥१६६॥ भा.टी.—कुचेलक, कुचेल, कुचिला, कुचिल, विषतिन्दु, तिन्दु, तिन्दुक, विषतिन्दुक, कारस्कर, रम्यफल, कुपाक, विषमुष्टिका, विषमुष्टि, कालकूट, ये सब नाम कुचला ( Nuxwomica ) के नाम कहे जाते हैं ॥१६५, १६६॥ विषतिन्दुकस्य परिचयः कारस्करः समाख्यातः शिखिजातीयकस्तरुः । काण्डोऽस्य वक्रः स्थूलश्च काण्डत्वग् भसितप्रभा ॥१६७॥ पत्रं तु वर्तुलं प्रायो मसृणं खल्वखण्डितम् । हरिद्वर्णं स्पष्टशिरं ह्रस्वकं पत्रवृन्तकम् ॥१६८॥