रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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कुचला मदात्यय तथा नाडीशूल को नष्ट करता है। इसके बहुत अल्पमात्रा में सेवन से अनिद्रा रोग तथा बवासीर रोग में आराम आता है। राजयक्ष्म (थाय- सिस) में होनेवाले रात्रि स्वेद को यह सुखा देता है। अधिक पढ़ना-लिखना या विचार करना आदि मानसिक परिश्रम करने से होनेवाली शिथिलता को दूर करता है। यह नींद न आने के कारण होनेवाले अजीर्ण को मिटाता है और दूध को पचाता है। निम्नलिखित रोगी के तत्तत् लक्षणों की उत्पत्ति में कुचला को बहुत ही अल्पमात्रा में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। यदि रोगी बहुत ही एकान्त प्रिय हो या उसका विभिन्न कारणों से तीव्र क्रोध आने का स्वभाव हो गया हो तो उसे न्यूनातिन्यून मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। खट्टी और कड़वी रसवाले डकारों को यह नष्ट करता है। परिश्रम जन्य मलबद्धता (कब्जि यत) मानसिक दुर्बलता के साथ होने पर इसके प्रयोग से लाभ होता है। नूतन या पुरातन भोजनोत्तर होनेवाले और सदा मुख का स्वाद खट्टा रखनेवाले आधमान रोग को यह शीघ्र नष्ट करता है। चिरकालिक अम्लपित्त रोग के कारण होनेवाले अन्त्रशूल में (जिससे मन में बहुत खिन्नता रहती हो पेट में भयंकर अफ़ारा होता हो) यह बहुत लाभ करता है। मलत्याग करने की इच्छा बनी रहने पर पेट में बार-बार पीड़ा होते रहने पर बड़ी कठिनाई के साथ बहुत थोड़ा शौच (टट्टी) होनेवाले कब्ज में कुचला लाभ करता है। इसी तरह मूत्र करने की इच्छा बनी रहने पर और बहुत थोड़ा मूत्र आने पर साथ ही मूत्र करते हुए मूत्रेन्द्रिय में दाह वेदनायुक्त मूत्र की रुकावट में कुचला लाभ करता है। इसी तरह ऐसी पुरानी माहवारी की विकृति में भी यह लाभ करता है जो समय अर्थात् २७, २८, २९ ३० दिन से पूर्व होती हो और उसमें अधिक रक्त निकलता हो। श्वेतप्रदर में जब गर्भाशय से पीला और दुर्गन्धित स्राव वेदना के साथ होता हो तो कुचला ऐसी अवस्था में लाभ करता है। रात्रि में सोने पर कमर और पीठ में होनेवाली तीव्र वेदना को कुचला-प्रयोग शान्त करता है। ऐसे नवीन प्रतिश्याय में जिसमें दिन में नासिका से स्राव होता हो और निकलना बन्द हो जाता हो तो कुचला प्रयोग लाभ करता है। भोजन करने के बाद पित्तप्रकोप से होनेवाले श्वास रोग में तथा हर समय नेत्र पलकों के फड़कते रहने पर कुचला प्रयोग से आराम आता है। रात्रि जागरण करने अथवा अधिक भोजन करने से प्रातःकाल बढ़ जानेवाले अतीसार में जिसमें रोगी को अधिक तृष्णा लगती हो और मल निकलते समय ऐसा शब्द होता हो, मल रक्तवर्ण और गाढ़ा अथवा जल के सदृश बहुत पतला और बड़े वेग के साथ