रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextभाग में लेकर खरल में एकत्र डालकर जम्बीरी निम्बू के रस से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको अग्निस्तुण्डीरस के नाम से कहा जाता है। यह अग्निस्तुण्डी रस उत्तम दीपक और पाचक है। अग्निमान्द्य को नष्ट करता है। नाड़ियों की कार्यशक्ति को बढ़ाता है। अर्शरोग को शान्त करता और अतीसार को नष्ट करता है। कमर तथा पीठ में होनेवाली वेदनाओं को शान्त करता है ॥२१०-२१५॥ लक्ष्मीविलासो रसः कुचेलकं सुविमलं रसस्तोलकसम्मितम् । सुपुष्पितं च सौभाग्यं मरिचं चैव तन्मितम् ॥२१६॥ लोहं द्विकर्षप्रमितं गन्धेशौ द्वयेकभागिकौ । सर्वं सम्मेल्य यत्नेन भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥२१७॥ वरीभूधात्रिकाभृङ्गेश्वरसेन च भावयेत् । निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिता ॥२१८॥ समाख्यातो रसो लक्ष्मीविलास इति नामतः । तारुण्यलक्ष्मीमतुलां प्रददाति रसो ह्ययम् ॥२१९॥ रोगदुर्बलदेहानां कृशानां क्षीणरेतसाम् । देहपुष्टिकरः कामं तथा वीर्यविवर्द्धनः ॥२२०॥ बलवर्णकरो वृष्यो वह्निमान्द्यविनाशनः । रक्तसञ्जननश्चैव तथा लावण्यवर्द्धनः ॥२२१॥ लक्ष्मीविलासः—रसस्तोलकं षट् तोलकम्, लोहं ४ तो०, गन्धकः २ तो०, पारदः १ तो० । भूधात्रिका तामलकी ॥२१६-२२१॥ भा.टी.—शुद्ध कुचलाचूर्ण छः तोला, सुहागाखील छः तोला, कालीमिर्च चूर्ण छः तोला, लोहभस्म चार तोला, शुद्ध गन्धक दो तोला, शुद्ध पारद एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली कर लें। फिर इसमें अन्य औषधियाँ खरल में अदरक के रस से मर्दन करें, फिर इसको शतावर मुंडी, आंवला और भांगरे के स्वरस की तीन-तीन भावना देकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको “लक्ष्मी विलास” नाम से कहा जाता है। इस रस के सेवन से शरीर में अत्यधिक तरुणावस्था की शोभा बढ़ जाती है। रोग से दुर्बल हुए शरीरवालों, कृश, तथा नष्ट वीर्य मनुष्यों के लिये यह शारीरिक पुष्टि को उत्पन्न