रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्विंशस्तरङ्गः ६६५ उनमें होनेवाला उद्वर्त्त कम हो जाता है और शुष्ककास को आराम आता है। अफीम का मुख्य प्रभाव नाड़ी मंडल पर होता है। थोड़ी मात्रा में अफीम देने से मस्तिष्क उत्तेजित होता है, जिससे अफीम खानेवाले को प्रसन्नता और आराम का अनुभव होता है। कई मनुष्य थोड़ी अफीम खाकर ही अपना काम ठीक कर सकते हैं। अफीम की इस उत्तेजना के पीछे मन्दता और उसके पीछे तन्द्रा और फिर निद्रा की अवस्था आती है। थोड़ी मात्रा में खाने पर केवल मन्दता की अवस्था तक ही प्रभाव होता है और शेष दोनों अवस्थाएँ नहीं आती हैं। मन्दता की अवस्था में श्रवण, दर्शन और स्पर्श की इन्द्रियां कुछ कुण्ठित हो जाती हैं। निद्रा और तन्द्रा की अवस्था में शरीर की सब प्रकार की शूल नष्ट हो जाती है। अफीम की अधिक मात्रा खाने पर प्रथम उत्तेजना की अवस्था क्षणिक ही होती है तथा शीघ्र ही निद्रा या मोह- निद्रा की अवस्थायें आ जाती हैं, जिससे मस्तिष्क की सब क्रियायें मन्द हो जाती हैं। पुतलियां संकुचित होकर कई बार सुई की नोक के बराबर हो जाती हैं। अतः अफीम नाड़ीमण्डल का उत्तेजक, शूलहर, निद्राजनक और मादक द्रव्य है। उत्तेजक प्रभाव बहुत थोड़ी देर रहता है, परन्तु पीछे मन्दता का प्रभाव ही स्थिर रहता है। अफीम का मांसपेशियों पर भी मन्दता रूप प्रभाव होता है, परन्तु अधिक मात्रा में दिये जाने पर भी मांस पेशियों में पूर्ण मन्दता नहीं आती है। अफीम की विषैली मात्रा खाये जानेपर भी रोगी को सहारा देकर उसकी टाँगों पर चला सकते हैं। अफीम देने से मूत्र की मात्रा घट जाती है। यह स्रावों के लिए शोषक है, परन्तु स्वेद और स्तन्य पर इसका शोषक प्रभाव कम होता है। इसके देने से यदि मूत्र के साथ खांड आती हो तो वह भी कम हो जाती है। अफीम का निष्क्रमण आंतों द्वारा होता है, अतः इसका विशेष प्रभाव आंतों पर ही होता है। अहिफेनस्य निषेधः न बालेषु न वृद्धेषु मधुमेहप्रपीडिते । शीतपादकरायाञ्च विषूच्यां खलु नैव च ॥२५६॥ न श्लैष्मिके तथा कासे प्रचुरश्लेष्मनिर्गमे । अहिफेनं वृक्कशोथे प्रयुञ्जीत न कर्हिचित् ॥२५७॥ अहिफेनसेवननिषेधः न बालेष्विति। हृदयगत्यवसादकत्वादिगुणयोगात् विषप्रभाववत्त्वाच्च बालादिष्वस्य सेवननिषेधः। श्लैष्मिककासे तु शोषकत्वात् । वृक्कशोथे च मूत्रग्राहित्वात् इत्यवधेयम् ॥२५६, २५७॥