रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्विंशस्तरङ्गः ७१५ फैल जाती है। अत्यधिक मात्रा में खाये जाने पर रोगी प्रलाप करता लड़-खड़ा कर चलता है और उसकी नाड़ी तथा हृदय भी तीव्रता से चलते हैं। इसके लिए प्रथम वमन करा दें। वमन के बाद रोगी को चाय या काफी का तीव्र घोल पिला दें। यदि विष का वेग अधिक हो जिससे हृदय तथा नाड़ी अत्यधिक तेज चले और मृत्यु का डर हो तो रोगी को उत्तेजनाशामक द्रव्य जैसे अफीम या अफीम के योग जैसे Morphine का सूचीवेध कर दें। मूत्र बन्द होने पर मूत्रशलाका से मूत्र को निकाल लें। धत्तूरस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जार्धं तु विशोधितम् । धत्तूरबीजचूर्णन्तु प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥३६७॥ गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् । चूर्णं धत्तूरपत्राणां प्रणाचार्यः प्रयोजयेत् ॥३६८॥ धत्तूरबीजमात्रा गुञ्जाचतुर्थांशात् गुञ्जार्धं यावत् । चूर्णमात्रा तु गुञ्जार्धतः सार्धगुञ्जम् ॥३६७, ३६८॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक समझनी चाहिए। यदि धत्तूरपत्रचूर्ण का प्रयोग करना हो तो इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक समझनी चाहिए। ३६७, ३६८॥ धत्तूरस्य आमयिकः प्रयोगः धत्तूरमूलं पत्रं वा सम्पेष्य विम्लाम्भसा । कवोष्णस्तूपनाहेन ब्रध्नशोथं व्यपोहति ॥३६६॥ धूर्तपत्रद्रवे पिष्टं निफेनं सरसाञ्जनम् । विनिहन्ति विशेषेण नेत्राभिष्यन्दमुल्बणम् ॥३७०॥ धत्तूरपत्रस्वरसः कवोष्णः स्वल्पमात्रया । निक्षिप्तं नाशयत्याशु कर्णशूलमसंशयम् ॥३७१॥ धूर्तबीजानि सम्पेष्य वटिका खलु निर्मिता । कृमिदन्तस्थरन्ध्रस्थां वेदनां हन्ति दारुणाम् ॥३७२॥ धूर्तपत्रं निशाफेनयुतं पिष्ट्वाम्लाम्भसा । प्रलेपान्नाशयत्याशु स्तनश्वयथुवेदनाम् ॥३७३॥ धत्तूरदलकल्केन तैलपाकविधानतः । साधितं सार्षपं तैलं हन्ति पेशीगतानिलम् ॥३७४॥