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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 778 of 799

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Page 778

४८ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७५३ आसन्नमरणान् मर्त्यान् यतः सञ्जीवनाह्वयः ॥५७३॥ श्वासं प्रलापं बाधिर्यं मूकतां हिमगात्रताम् । रसोऽयं नाशयेत्तूर्णामासन्नमरणाश्रयान् ॥५७४॥ मृतसंजीवनरसः—विषं वत्सनाभः, तालं हरितालम् ।.५७१-५७४॥ भा.टी.-शुद्ध कृष्णसर्पविष, शुद्ध वत्सनाभ, स्वर्णमाक्षिक भस्म, सुहागा, शुद्ध हिंगुल, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध हरताल, प्रत्येक एक एक मासा लेवें। पहले पारे गन्धक तथा हिंगुल की एकत्र कज्जली बना लें। फिर इसमें अन्य द्रव्य मिलाकर बकरी, मोर, सूअर और मछली के पित्त की पृथक्-पृथक् तीन अथवा सात भावना देवें। गोली बनाने योग्य होने पर छोटी सरसों के बराबर प्रमाण की गोलियाँ बनाकर रखलें। क्योंकि यह रस सेवन करने से बिलकुल मृत्युमुख में गये हुए मनुष्यों के जीवन की रक्षा करता है, अतः इसको मृतसञ्जीवन (मरे हुए को बचानेवाला) रस कहा जाता है। मृत्यु के समय होनेवाले तीव्र श्वास, बहिरापन, तुतलाहट और शरीर का ठण्डा हो जाना आदि उपद्रवों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥५७१-५७४॥ रक्तचित्रकशोधनम् रक्तचित्रकमूलं तु चूर्णतोये निमज्जयेत् । ततो निदाघसंशुष्कं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥५७५॥ रक्तचित्रकमूलादिशोधनपाठाः—स्पष्टार्थाः । केचित्तु एरण्डबीजमरिच- पिप्पलीनामपि शुद्धिं स्मरन्ति--तत्र च एरण्डबीजं नारिकेलोदकेन स्विन्नं, मरिचञ्चाम्लतक्रेण भावितं, पिप्पली च चित्रकरसैः भाविता शुद्ध्यति-इति ॥५७५॥ भा.टी.—लाल चित्रक को चूने के पानी की भावना देकर धूप में सुखा लेने से शुद्धि हो जाती है ॥५७५॥ वृद्धदारकशोधनम् वृद्धदारकबीजानि दोलायन्त्रे तु यामकम् । स्विन्नानि गव्यपयसा विशुद्ध्यन्ति न संशयः ॥५७६॥ भा.टी.—विदहारे के बीजों को एक कपड़े में बांधकर पोटली बनालें, अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गोदुग्ध भर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करें तो विदहाराबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥५७६॥ वक्तव्य—कई वैद्य एरण्डबीज, कालीमिर्च, पिप्पली तथा चित्रकत्वक् की भी शुद्धि करने को कहते हैं, परन्तु साधारणरूप से इनको शुद्ध नहीं किया