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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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परिशिष्ट ७५७ समभाग में लेकर एकत्र खरल में वच और ब्राह्मीकषाय की २१-२१ भावना और मालकांगनीतैल की एक भावना देकर सुखाकर रख लें। पहिले मालकां- गनीतैल की भावना बाद को ब्राह्मी-वचकषाय की भावना देने से गोलियाँ अच्छी तरह बन सकती हैं। कई रसचिकित्सक इसमें स्वर्णमाक्षिकभस्म भी एक भाग मिलाते हैं, जिससे इसमें गुणों की वृद्धि पायी जाती है। मात्रा—आधी रत्ती से एक रत्ती तक मक्खन या घी के साथ देवें। उपयोग—यह रस अपस्मार को दूर करने में अत्यन्त उपयोगी है। यह स्राववाहिनी और वातवाहिनियों पर शामक प्रभाव करता है। चेष्टावाही नाड़ियों के क्षोभ को शान्त करने में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। अपस्मार की भाँति यह उन्माद तथा हिस्टीरिया (जो गर्भाशय की विकृति से हो) तथा बाल- 'ग्रह रोग में भी यह अतिलाभकारी है। स्त्रियों को गर्भावस्था में तीव्र यकृत्संकोच और गर्भवात के कारण जड़ता, मन्दता, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा, वमन आदि लक्षण होने पर इसके सेवन से लाभ होता है। संन्यास-रोग में निश्चेष्टता, शीतलता, लालास्राव और वातकफात्मक लक्षण होने पर स्मृतिसागर का उत्तम उपयोग होता है। सुषुम्णा तथा मस्तिष्कावरण की विकृति के कारण जिन अपतन्त्रक आदि विकारों में आक्षेप होते हों, यदि इनके साथ कफ का संसर्ग और जड़ता आदि लक्षण हों तो यह रस उत्तम कार्य करता है। अकस्मात् स्मृतिभ्रंश में भी यह लाभदायक है। संक्षेपतः इसका कार्य मनोदेश, सुषुम्णा, आज्ञावाहिनियों और स्नायुओं पर शामक और आक्षेपहर होता है। शिलाञ्जन शुद्ध मैनसिल, पिप्पली, मरिच, वच, सिरस के बीज, लहसुन और सैन्धा- नमक; इन सबको समभाग में लेकर चूर्ण बना इसको बकरी के मूत्र में घोटकर अञ्जन बना लें। इस शिलाञ्जन को आँखों में आँजने से सन्निपात की मूर्च्छा तथा तन्द्रा-उपद्रव में आराम आता है। द्वितीय शिलाञ्जन शुद्ध मैनसिल, लहसुन, पिप्पली, सिरसबीज तथा सैन्धानमक, प्रत्येक सम- भाग लेकर सूक्ष्म चूर्ण कर लें। इसको मधु में मिलाकर आँखों में आँजने से सन्निपात की तन्द्रा में शीघ्र आराम आता है।