रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextपरिशिष्ट ७६३ बल पैदा करना है। बाहर से देखने पर रोगी हृष्ट-पुष्ट दीखता हो, किन्तु भीतर से धीरे-धीरे शक्ति क्षीण हो रही हो और शरीर का भार भी बिना किसी रोग के घट रहा हो तो यह रस उत्तम लाभ करता है। आँतों में शोथ, ग्रन्थिपीड़ा के साथ अग्निमान्द्य, अरुचि, अतीसार, मन्दज्वर आदि लक्षण युक्त आन्त्र क्षय में इसका उपयोग उत्तम कार्य करता है। इसके अतिरिक्त यह रस अग्नि-प्रदीपक, बल्य तथा रसायन माना जाता है। राजयक्ष्मा में जब ज्वर तीव्र हो तो इसे नहीं देना चाहिए, बल्कि पञ्चामृतरस का प्रयोग करके ज्वर शान्त होने पर घी का प्रयोग करना चाहिए। बालचन्द्ररस स्वर्णभस्म १ तोला, शुद्ध सोना गेरू ३ तोला, मुक्तांपिष्टी १२ तोला लें। अब तीनों को एकत्र मिला अच्छी तरह खरल करके रखलें। मात्रा—१-१ रत्ती दिन में २-४ बार मक्खन मिश्री, गिलोयसत, शर्बत, अनार, दाडिमावलेह या वासावलेह के साथ देवें। गुण—यह रसायन राजयक्ष्मा रोग में होने वाली वान्ति, उवाक, अती- सार, अरुचि, श्वासोच्छ्वास में कष्ट, पीनस, शुष्क कास, श्वास और रक्तपित्त आदि उपद्रवों को दूर करता है और कृत्रिम विष तथा दूषित विषजनित दाह आदि का शमन करता है। यह रस रक्तगत कीटाणु और विष का नाश करता है। मस्तक और वात- वाहिनियों पर शामक असर पहुँचाता है। हृदय के लिए बल्य है और पाचन- संस्थानगत सेन्द्रिय विष को नष्ट करता है। सूतशेखर रस शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, सुहागे का फूला, शुद्ध वत्सनाभ, स्वर्णभस्म, ताम्रभस्म, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, शुद्ध धतूरे के बीज, तेजपत्र, नागकेशर, इलायचीबीज, बेलगिरी, शंखभस्म, कचूर, सबको समभाग लेकर एकत्र घोटकर भांगरे के स्वरस से ७ दिन मर्दन करके एक २ रत्ती की गोलियाँ बनालें। मात्रा—१ से ३ गोली दिन में २ से ३ बार दध-मिश्री, घी और शहद अथवा रोग के अनुसार अनुपान से देवें। उपयोग—संक्षेपतः इस रसायन के सेवन से अम्लपित्त, वमन, शूल, गुल्म, कास, संग्रहणी, दाह, त्रिदोष, अतीसार, श्वास, मन्दाग्नि, भयंकर हिचकी, उदावर्त, ज्वर, क्षय आदि रोग ४० दिन में निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं।