ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextबैठकर हमारे सामने आओ. शोभनपुत्रों वाली अदिति हमारे कुशों पर बैठें. मरणरहित देवगण स्वाहा के साथ एकाकार बनकर प्रसन्न हों. (११) सूक्त—३ देवता—अग्नि अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्. यो मर्त्येषु निध्रुविॠतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः.. (१) हे देवो! तुम अन्य अग्नियों के साथ प्रकाशित एवं अतिशय यज्ञपात्र उन अग्नि देव को यज्ञों में देवों का दूत बनाओ, जो मनुष्यों में अधिक स्थिर, यज्ञयुक्त, तापसहित तेज वाले, घृतयुक्त अन्न वाले व शुद्धिकर्त्ता हैं. (१) प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्. आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति.. (२) जिस समय दारुरूप अग्नि घास खाते एवं हिनहिनाने वाले घोड़ों के समान पेड़ों में स्थित रहते हैं, उस समय उनकी दीप्ति वायु के सहारे प्रकाशित होती है. हे अग्नि! इसके पश्चात् तुम्हारा मार्ग काले रंग का हो जाता है. (२) उद्यस्य ते नवजातस्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरा इधानाः. अच्छा द्यामरुषो धूम एति सं दूतो अग्न ईयसे हि देवान्.. (३) हे नवजात एवं कामपूरक अग्नि! तुम्हारी जो धूमरहित ज्वालाएं उठती हैं, उनको प्रकट करता हुआ धुआं आकाश में जाता है. हे अग्नि! तुम दूत बनकर देवों के पास जाते हो. (३) वि यस्य ते पृथिव्यां पाजो अश्रेत्तृषु यदन्ना समवृक्त जम्भैः. सेनेव सृष्टा प्रसितिष्ट एति यवं न दस्म जुह्वा विवेक्षि.. (४) हे अग्नि! जिस समय तुम ज्वलारूपी दांतों से काष्ठरूपी अन्न को खाते हो, उस समय तुम्हारा तेज शीघ्रता से धरती पर फैलता है. तुम्हारी ज्वाला सेना के समान उन्मुक्त होकर जाती है. हे दर्शनीय अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं से काष्ठों में जौ आदि के समान प्रवेश करते हो. (४) तमिद्दोषा तमुषसि यविष्ठमग्निमर्त्यं न मर्जयन्त नरः. निशिशाना अतिथिमस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः.. (५) अतिशय युवा अतिथि के समान पूज्य अग्नि को यज्ञशाला में रात-दिन प्रज्वलित करते हुए लोग सततगामी अश्व के समान उनकी पूजा करते हैं. बुलाए हुए एवं अभिलाषापूरक अग्नि की शिखा दीप्त होती है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*