ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूर्य के समान दीप्त, पानी की बूंद के समान श्वेत, हरिण के समान शक्तिशाली, महान् स्तोत्रों वाले, जल के रचयिता, दुःख से छुटकारा दिलाने की शक्ति से युक्त एवं इस संसार के स्वामी वरुण ने सागर को स्थिर बनाया है. (६) यो मृळयाति चक्रुषे चिदागो वयं स्याम वरुणे अनागाः. अनु व्रतान्यदितेर्ऋधन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वरुण अपराध करने वाले पर भी दया करते हैं. मैं दीनतारहित वरुण से संबंधित व्रतों को बढ़ाता हुआ पापरहित बनूंगा. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—८८ देवता—वरुण प्र शुन्ध्युवं वरुणाय प्रेष्ठां मतिं वसिष्ठ मीळहुषे भरस्व. य ईमर्वाञ्चं करते यजत्रं सहस्रामघं वृषणं बृहन्तम्.. (१) हे वसिष्ठ! तुम अभिलाषापूरक वरुण के प्रति स्वयं शुद्ध एवं प्रिय लगने वाली स्तुति उच्चारित करो. वे यज्ञ योग्य, अनेक धनों के स्वामी, अभिलाषापूरक एवं विस्तृत सूर्य को हमारे सामने लाते हैं. (१) अधा न्वस्य सन्दृशं जगन्वानग्नेरनीकं वरुणस्य मंसि. स्वर्यदृशमन्निधिपा उ अन्धोऽभि मा वपुर्दृशये निनीयात्.. (२) मैं इस समय शीघ्रता से वरुण के दर्शन करके अग्नि की ज्वालाओं की स्तुति करता हूं. जिस समय वरुण पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए शोभन सोमरस को अधिक मात्रा में पी लेते हैं, उस समय मुझे अपने शोभनरथ के दर्शन कराते हैं. (२) आ यद्रुहाव वरुणश्च नावं प्र यत्समुद्रमीरयाव मध्यम्. अधि यदपां स्नुभिश्चराव प्र प्रेङ्ख ईङ्खयावहै शुभे कम्.. (३) जिस समय मैं और वरुण नाव पर सवार हुए थे. नाव को हमने सागर के बीच चलाया था एवं जल पर तैरती हुई नाव पर हम थे, उस समय हमने नावरूपी झूले पर सुख के निमित्त क्रीड़ा की थी. (३) वसिष्ठं ह वरुणो नाव्याधादृषिं चकार स्वपा महोभिः. स्तोतारं विप्रः सुदिनत्वे अह्नां यान्नु द्यावस्ततन्वन्द्यादुषासः.. (४) मेधावी वरुण ने रात एवं दिन का विस्तार करते हुए उत्तम दिनों में स्तोता मुझ वसिष्ठ को नाव पर चढ़ाया था एवं रक्षासाधनों द्वारा शोभनकर्म वाला बनाया था. (४) ebook converter DEMO Watermarks*