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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1143 of 1855

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Page 1143

इन्द्रवायू वीरवाहं रथं वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते.. (५) हे सबके स्वामी इंद्र एवं वायु! प्रसिद्ध यजमान सच्चे मन से स्तुति करते हुए एवं दीप्तिसंपन्न बनकर अपने कर्मों द्वारा तुम्हारे उस रथ को अपने यज्ञों में खींचते हैं, जो वीरों द्वारा खींचने योग्य हैं. यज्ञ में हव्यरूप अन्न तुम्हारी सेवा करते हैं. (५) ईशानासो ये दधते स्वर्णो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्हिरण्यैः. इन्द्रवायू सूरयो विश्वमायुर्वद्भिर्वीरैः पृतनासु सह्युः.. (६) हे इंद्र एवं वायु! जो सामर्थ्य वाले लोग हमें गांवों, घोड़ों, निवासस्थानों एवं स्वर्ण आदि धन के साथ सुख देते हैं, वे ही दाता युद्ध में घोड़ों एवं वीर पुरुषों की सहायता के सर्वत्र व्याप्त अन्न जीत लेते हैं. (६) अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः. वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) घोड़ों के समान हव्य-वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७) सूक्त—९१ देवता—वायु कुविदङ्ग नमसा ये वृद्धासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्. ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण.. (१) प्राचीन काल में जिन वयोवृद्ध स्तोताओं ने वायु देव के हेतु शीघ्र बनाए गए बहुत से स्तोत्रों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की, उन्होंने विपत्ति में पड़े मनुष्यों की रक्षा के निमित्त वायु को हव्य देने के लिए सूर्य के साथ उषा को संगत किया. (१) उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः. इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्‍टे सुवितं च नव्यम्.. (२) हे कामना करने योग्य, गतिशील एवं रक्षक इंद्र व वायु! तुम हमारी हिंसा न करके अनेक मासों एवं वर्षों तक हमारी रक्षा करना. हमारी शोभनस्तुति समीप जाती हुई तुमसे सुख एवं प्रशंसायोग्य उत्तम धन की याचना करती है. (२) पीवोअन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः. ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (३) शोभनबुद्धि वाले एवं अपने घोड़ों को आश्रय देने वाले श्वेतवर्ण वायु अधिक अन्न के