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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1147 of 1855

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Page 1147

एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान्. मेन्द्रो नो विष्णुर्मरुतः परि ख्यन्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे अग्नि! शीघ्रतापूर्वक इस यज्ञ का सहारा लेते हुए हम एक साथ तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अन्न प्राप्त करें. इंद्र, विष्णु एवं मरुद्गण हमें त्यागकर दूसरे को न देखें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८) सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः. अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! इस स्तोता से यह उत्तम स्तुति उसी प्रकार उत्पन्न हुई है, जिस प्रकार बादल से वर्षा होती है. (१) शृणुतं जरितुर्हवमिन्द्राग्नी वनतं गिरः. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम स्तोता की पुकार सुनो और उसकी स्तुति स्वीकार करो. तुम सबके स्वामी हो, इसलिए यज्ञकर्म को पूरा करो. (२) मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये. मा नो रीरधतं निदे.. (३) हे नेता इंद्र एवं अग्नि! हमें हीनभाव, पराजय एवं निंदा के वश में मत करना. (३) इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (४) हम अपनी रक्षा की अभिलाषा से विस्तृत हव्यरूप अन्न, शोभनस्तुति एवं यज्ञकर्म- सहित-स्तुतिवचन इंद्र एवं अग्नि के पास भेजते हैं. (४) ता हि शश्वन्त ईळत इत्था विप्रास ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (५) बुद्धिमान् लोग अपनी रक्षा के लिए इंद्र व अग्नि दोनों की इस प्रकार स्तुति करते हैं. समान कष्ट भोगने वाले लोग अन्न पाने के लिए स्तुति करते हैं. (५) ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (६) स्तुति करने के इच्छुक हव्य अन्न से युक्त एवं धन की अभिलाषा वाले हम यज्ञ का फल पाने के लिए स्तुति द्वारा उन दोनों को बुलाते हैं. (६) इन्द्राग्नी अवसा गतमस्मभ्यं चर्षणीसहा. मा नो दुःशंस ईशत.. (७) हे शत्रुओं को हराने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम अन्न लेकर हमारे पास आओ. बुरे वचन