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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1413 of 1855

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Page 1413

सूक्त—१९ देवता—सोम यत्सोम चित्रमुक्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु. तन्नः पुनान आ भर.. (१) हे सोम! जो विचित्र, प्रशंसनीय, दिव्य एवं पृथ्वी का धन है, तुम निचुड़ते हुए हमें वह सब प्रदान करो. (१) युवं हि स्थः स्वर्षती इन्द्रश्च सोम गोपती. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२) हे सोम! तुम एवं इंद्र सबके स्वामी एवं गायों का पालन करते हो. तुम हमारे यज्ञकर्मों को पूरा करो. (२) वृषा पुनान आयुषु स्तनयन्नधि बर्हिषि. हरिः सन्योनिमासदत्.. (३) अभिलाषापूरक सोम शुद्ध होते समय अध्वर्यु आदि के बीच शब्द करते हैं. हरितवर्ण सोम कुशों के ऊपर अपने स्थान पर बैठते हैं. (३) अवावशन्त धीतयो वृषभस्याधि रेतसि. सूनोर्वत्सस्य मातरः.. (४) सोमरूपी बछड़े द्वारा पी जाती हुई वसतीवरीरूपी गाएं सोम के सारवान् होने की कामना करती हैं. (४) कुविद्वृषण्यन्तीभ्यः पुनानो गर्भमादधत्. याः शुक्रं दुहते पयः.. (५) दूध आदि में मिलाए जाते हुए सोम अभिलाषा करने वाली वसतीवरी के गर्भ के रूप में अपना रस अनेक बार धारण करते हैं. जल दीप्त रस को दुहते हैं. (५) उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रुषु. पवमान विदा रयिम्.. (६) हे शुद्ध किए जाते हुए सोम! हमारी जो अभिलषित वस्तुएं हैं, उन्हें हमारे समीप लाओ. हमारे शत्रुओं को भयभीत करो एवं उनका धन प्राप्त करो. (६) नि शत्रोः सोम वृष्ण्यं नि शुष्मं नि वयस्तिर. दूरे वा सतो अन्ति वा.. (७) हे निचोड़े जाते हुए सोम! शत्रु चाहे दूर हो या पास हो, तुम उसके तेज एवं अन्न का विनाश करो. (७) सूक्त—२० देवता—सोम प्र कविर्देववीतयेऽव्यो वारेभिरर्षति. साह्वान्विश्वा अभि स्पृधः.. (१)