ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1416 of 1855
Read in contextहैं. (३) एते मृष्टा अमर्त्याः ससृवांसो न शश्रमुः. इयक्षन्तः पथो रजः.. (४) दशापवित्र द्वारा शोधित एवं मरणरहित सोम हव्य रखने के स्थान से जाते हुए मार्गों एवं लोकों में जाने की इच्छा करते हैं तथा थकते नहीं हैं. (४) एते पृष्ठानि रोदसोर्विप्रयन्तो व्यानशुः. उतेदमुत्तमं रजः.. (५) ये सोम द्यावा-पृथिवी के ऊपर अनेक प्रकार से विचरण करके फैलते हैं एवं उत्तम द्युलोक में जाते हैं. (५) तन्तुं तन्वानमुत्तममनु प्रवत आशत. उतेदमुत्तमाय्यम्.. (६) नदियां यज्ञ का विस्तार करने वाले एवं उत्तम सोम को प्राप्त करती हैं. सोम इस कार्य को उत्तम बनाते हैं. (६) त्वं सोम पणिभ्य आ वसु गव्यानि धारयः. ततं तन्तुमचिक्रदः.. (७) हे सोम! तुम पणियों के पास से गायों का समूह एवं धन लाते हो तथा यज्ञ का विस्तार करने वाला शब्द करते हो. (७) सूक्त—२३ देवता—सोम सोमा असृग्रमाशवो मधोर्मदस्य धारया. अभि विश्वानि काव्या.. (१) शीघ्र चलने वाले सोम नशीले रस की मधुर धारा के साथ सभी स्तुतियों को सुनकर प्रकट होते हैं. (१) अनु प्रत्नास आयवः पदं नवीयो अक्रमुः. रुचे जनन्त सूर्यम्.. (२) अश्व के समान शीघ्रगामी एवं प्राचीन सोमों ने सूर्य को दीप्त करने के लिए नवीन स्थान पर गमन किया है. (२) आ पवमान नो भरार्यो अदाशुषो गयम्. कृधि प्रजावतीरिषः.. (३) हे पवमान सोम! तुम दान न करने वाले शत्रु का धनपूर्ण घर हमें दो तथा हमें संतान वाले अन्न से युक्त बनाओ. (३) अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्. अभि कोशं मधुश्चुतम्.. (४) गतिशील सोम नशीला रस तथा रस टपकाने वाले कोश क्षरित करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*