ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextएवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (८) इंद्र के मुख से निकली हुई वाणी सत्य, विविध विशेषताओं से युक्त, महती एवं गौएं देने वाली है. यज्ञ में हव्य देने वाले यजमान के लिए तो इंद्र की वाणी पके हुए फलों से लदी डाली के समान है. (८) एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (९) हे इंद्र! तुम्हारी विभूतियां हव्य प्रदान करने वाले हमारे समान यजमान की रक्षा करने वाली एवं शीघ्र फल देने वाली हैं. (९) एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (१०) सोमपान करने वाले इंद्र के लिए सामवेद एवं ऋग्वेद के मंत्र अभिलषित हैं. इंद्र सोमपान संबंधी मंत्रों की इच्छा करते हैं. (१०) सूक्त—९ देवता—इंद्र इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः. महाँ अभिष्टिरोजसा.. (१) हे इंद्र! इस यज्ञ में आकर सोमरस रूपी समस्त भोज्य पदार्थों से प्रसन्न बनो. इसके पश्चात् तुम परम शक्तिशाली बनकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो. (१) एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने. चक्रिं विश्वानि चक्रये.. (२) यदि आनंद देने वाला एवं कार्य संपादन की प्रेरणा करने वाला सोमरस तैयार हो तो उसे प्रसन्न एवं संपूर्ण कार्य सिद्ध करने वाले को भेंट करो. (२) मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे. सचैषु सवनेष्वा.. (३) हे सुंदर नासिका एवं ठोड़ी वाले तथा समस्त यजमानों द्वारा पूज्य इंद्र! तुम आनंद बढ़ाने वाली स्तुतियों से प्रसन्न होकर इस सवन नामक यज्ञ में पधारो. (३) असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत. अजोषा वृषभं पतिम्.. (४) हे इंद्र! मैंने तुम्हारी स्तुतियां की हैं. वे तुम्हारे समीप स्वर्ग में पहुंच गई हैं. तुमने उन स्तुतियों को स्वीकार कर लिया है. तुम मनचाही वर्षा करने वाले एवं यजमान के रक्षक हो. (४) सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम्. असदित्ते विभु प्रभु.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*