ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे सविता! हमारी स्तुतियां स्वीकार करो. तुम्हारा तेज अनेक यज्ञों को पाने की योग्यता रखता है. तुम शत्रुओं के गिरते हुए उज्ज्वल आयुधों से हमारी रक्षा करो. (२) चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः. चक्षुर्धाता दधातु नः.. (३) सविता देव, पर्वत एवं विधाता हमें आंखें प्रदान करें. (३) चक्षुर्नो धेहि चक्षुषे चक्षुर्विख्यै तनूभ्यः. सं चेदं वि च पश्येम.. (४) हे सूर्य! हमारी आंखों को देखने की शक्ति दो. हम सारी वस्तुओं को देख सकें, इसके लिए हमें आंखें दो. हम सभी चीजों को सामूहिक रूप से देखें. (४) सुसन्दृशं त्वा वयं प्रति पश्येम सूर्य. वि पश्येम नृचक्षसः.. (५) हे सूर्य! हम तुम्हें भली प्रकार देख सकें. तुम सबको भली प्रकार देखने वाले हो. हम मानव की आंखों से सब कुछ विशेष रूप से देखें. (५) सूक्त—१५९ देवता—शची उदसौ सूर्यो अगादुदयं मामको भगः. अहं तद्विद्वला पतिमभ्यसाक्षि विषासहिः.. (१) इस सूर्य का उदय मेरे भाग्य का उदय करेगा, यह मैं जान गई हूं. मैंने सब सौतों को पराजित करके पति को वश में कर लिया है. (१) अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचनी. ममेदनु क्रतुं पतिः सेहानाया उपाचरेत्.. (२) मैं ही केतु हूं, मैं ही मस्तक हूं, मैं ही प्रबल होकर स्वामी के मुख से मीठा वचन बुलवाती हूं. मेरे पति मेरे कार्यों की प्रशंसा करते हैं, मेरी सौतों के कार्यों की नहीं. मैंने सब सौतों को हरा दिया है. (२) मम पुत्राः शत्रुहणोऽथो मे दुहिता विराट्. उताहमस्मि सञ्जया पत्यौ मे श्लोक उत्तमः.. (३) मेरे पुत्र शत्रुहंता हैं एवं मेरी पुत्री विशेष रूप से शोभित होती है. मैं सबको विजय करती हूं और मेरे पति के समीप मेरी ही कीर्ति सर्वश्रेष्ठ है. (३) येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद् द्युम्न्युत्तमः. इदं तदक्रि देवा असपत्न किलाभुवम्.. (४) हे देवो! इंद्र जिस यज्ञ के द्वारा शक्तिशाली एवं उत्तम अन्न वाले बने हैं, मैंने वही किया है. इससे मैं शत्रुविहीन हो गई हूं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*