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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1844 of 1855

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Page 1844

इममिन्द्रो अदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा. तस्मै सोमो अधि ब्रवत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पतिः.. (३) इंद्र ने ध्रुव हवि पाकर इस राजा को स्थिर बनाया है. सोम एवं ब्रह्मणस्पति ने उसे आशीर्वाद दिया है. (३) ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे. ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम्.. (४) जिस प्रकार द्युलोक, धरती, ये पर्वत एवं सारा विश्व ध्रुव है, उसी प्रकार प्रजाओं के बीच यह राजा भी अविचल रहे. (४) ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः. ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (५) हे राजन्! राजा वरुण, देव बृहस्पति, इंद्र एवं अग्नि तुम्हारे राज्य ध्रुव रूप में धारण करें. (५) ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभि सोमं मृशामसि. अथो त इन्द्रः केवलीर्विशो बलिहृतस्करत्.. (६) हे राजन्! हम अविनाशी पुरोडाश के साथ स्थिर सोमरस को मिलाते हैं इसलिए इंद्र ने तुम्हारी प्रजाओं को भक्त एवं कर देने वाली बनाया है. (६) सूक्त—१७४ देवता—राजस्तुति अभीवर्तेन हविषा येनेन्द्रो अभिवावृते. तेनास्मान्ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्तय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! जिस हवि से इंद्र ने सब कुछ प्राप्त किया है, हम उसी हवि से यज्ञ करते हैं. तुम हमें राज्यप्राप्ति में लगाओ. (१) अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः. अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो न इरस्यति.. (२) हे राजन्! शत्रुओं, सेना लेकर चढ़ाई करने वालों, दानरहित लोगों एवं हमसे द्वेष करने वालों को पराजित करो. (२) अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृतत्. अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*