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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 202 of 1855

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Page 202

विभुर्विश्वस्मै भुवनाय मेधिरो द्विमाता शयुः कतिधा चिदायवे.. (२) हे अग्नि! तुम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों में प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ हो. तुम बुद्धिमान् हो और देवों के यज्ञों को सुशोभित करते हो. तुम सारे संसार पर अनुग्रह के लिए अनेक रूप से व्याप्त हो. तुम मेधावी एवं दो लकड़ियों से उत्पन्न हो. मनुष्यों का कल्याण करने के लिए तुम भिन्नभिन्न रूपों में सब जगह रहते हो. (२) त्वमग्ने प्रथमो मातरिश्वन आविर्भव सुक्रतूया विवस्वते. अरेजेतां रोदसी होतूर्वूर्येऽसघ्नोर्भारमयजो महो वसो.. (३) हे अग्नि! तुम वायु की अपेक्षा प्रमुख हो और यजमान के निकट सुंदर यज्ञ को पूर्ण करने की इच्छा से प्रकट हो जाओ. तुम्हारी सामर्थ्य देखकर धरती और आकाश कांप उठते हैं. तुमने श्रेष्ठ होता के रूप में यज्ञ का कार्य स्वीकार किया है. तुम्हारे यज्ञ में निवास के कारण पूज्य देवताओं के यज्ञ पूर्ण हुए हैं. (३) त्वमग्ने मनवे द्यामवाशयः पुरूरवसे सुकृते सुकृत्तरः. श्वात्रेण यत्पित्रोर्मुच्यसे पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः.. (४) हे अग्नि! तुमने मनु पर अनुग्रह करके यह बताया था कि किन कर्मों से स्वर्ग मिलता है. तुमने अपने सेवक पुरूरवा को शोभन फल दिया. दोनों काष्ठ तुम्हारे माता-पिता हैं. उनके घर्षण से तुम उत्पन्न होते हो. ऋत्विज् तुम्हें पहले वेदी के पूर्व भाग में ले जाते हैं, बाद में पश्चिम भाग में. (४) त्वमग्ने वृषभः पुष्टिवर्धन उद्यतस्रुचे भवसि श्रवाय्यः. य आहुतिं परि वेदा वषट्कृतिमेकायुरग्रे विश आविवाससि.. (५) हे अग्नि! तुम अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले हो एवं यजमान को धन आदि से पुष्ट करते हो. हे एकमात्र अन्नदाता! जो यजमान यज्ञपात्र उठाते हुए तुम्हारा यश गाता है एवं वषट्कार शब्द के साथ तुम्हें आहुति देता है, तुम उसे पहले प्रकाश देते हो, उसके बाद सारे संसार को. (५) त्वमग्ने वृजिनवर्तनिं नरं सकमन्विपर्षि विदथे विचर्षणे. यः शूरसाता परितक्म्ये धने दभ्रेभिश्चित्समृता हंसि भूयसः.. (६) हे विशिष्ट ज्ञानसंपन्न अग्नि! तुम सदाचारहीन मनुष्य को ऐसे काम में लगाते हो, जिससे उसका उद्धार हो सके. जब विस्तृत युद्ध चारों ओर भली-भांति आरंभ हो जाता है तो तुम्हारी कृपा से थोड़ी संख्या वाले एवं वीरताशून्य लोग बड़े-बड़े वीरों का वध कर डालते हैं. (६) त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्तं दधासि श्रवसे दिवेदिवे. यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*