ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 211 of 1855
Read in contextत्रयः स्कम्भासः स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा.. (२) समस्त देवता चंद्रमा और उसकी सुंदरी पत्नी वेना के विवाह में जा रहे थे, तब उन्हें पता लगा कि मधुर भोज्य-पदार्थ को ढोने वाले रथ में तीन पहिए हैं. उस रथ के ऊपर सहारा लेने के लिए खंभे हैं. हे अश्विनीकुमारो! इस प्रकार के रथ द्वारा तुम दिन में तीन बार आओ और रात में भी तीन बार आओ. (२) समाने अहन्नित्रवद्यगोहना त्रिराद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम्. त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम दिन में तीन बार आकर यज्ञकर्म की त्रुटियां दूर करो. आज यज्ञ का द्रव्य मधुर रस से तीन बार सींचो. रात और दिन में तीन-तीन बार बलकारक अन्न से हमारा पोषण करो. (३) त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम्. त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! हमारे निवासस्थान में तीन बार आओ. हमारे अनुकूल कार्य करने वाले मनुष्य के पास तीन बार आओ. जो लोग तुम्हारे द्वारा रक्षणीय हैं, उनके पास तीन बार आओ. हमें तीन प्रकार से शिक्षा दो. हमें तीन बार प्रसन्नताकारक फल दो. जिस प्रकार मेघ जल देते हैं, उसी प्रकार तुम हमें तीन बार जल दो. (४) त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः. त्रिः सौभाग्यत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहितारुहद्रथम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! हमें तीन बार धन प्रदान करो. हमारे देवों संबंधी यज्ञ में तीन बार आओ. तीन बार हमारी बुद्धि की रक्षा करो. तीन बार हमारे सौभाग्य की रक्षा करो. हमें तीन बार अन्न दो. तुम्हारे तीन पहिए वाले रथ पर सूर्य की पुत्रियां सवार हैं. (५) त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्यः. ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती.. (६) हे अश्विनीकुमारो! स्वर्गलोक की ओषधि हमें तीन बार दो. पृथ्वी पर उत्पन्न ओषधि हमें तीन बार दो. आकाश से हमें तीन बार ओषधि दो. हे बृहस्पति के पोषको! हमें वात, पित्त, कफ—इन तीनों धातुओं से संबंधित सुख दो. (६) त्रिर्नो अश्विना यजता दिवेदिवे परि त्रिधातु पृथिवीमशायतम्. तिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वातः स्वसराणि गच्छतम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुम प्रतिदिन यज्ञ में बुलाने योग्य हो. तुम तीन बार धरती पर आकर ebook converter DEMO Watermarks*