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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)

Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)

DevanagariHindipublished424 pages

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१६श्रीसाम्बपुराणम्

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—जब पिता ने अपने पुत्र को इस प्रकार शाप दिया, तभी उसे कुष्ठरोग हो गया तथा वह कुरूप हो गया।।५१।।

साम्बेन पुनरप्येवं दुर्वासां कोपिता मुनिः।
भाव्येनार्थेन चात्यर्थं पूर्वानुस्मरणेन वै ॥५२॥
प्राप्तवान् सुमहच्छापं साम्बो वै मनुजोत्तमः।
तच्छापान्मुसलं जातं कुलं येनाऽस्य पातितम् ॥५३॥

इसी प्रकार एक बार साम्ब से दुर्वासा मुनि कुपित हो गये थे और भवितव्यता के चलते पूर्व वृत्तान्त का स्मरण न रहने से नरश्रेष्ठ साम्ब ने सुमहत् शाप पाया था। उस शाप से उनके पेट से मूसल उत्पन्न हुआ था, जिसके द्वारा यदुवंश का संहार हो गया था।।५२-५३।।

श्रुत्वा दुर्विनयाद्दोषानेवमादीन् विपश्चिता।
नित्यं भाव्यं विनीतेन गुरुदेवद्विजातिषु ॥५४॥

दुर्विनय के इस प्रकार के दोष को सुनकर विज्ञजनों को गुरु, देवता तथा ब्राह्मणों के सम्मुख विनीत हो जाना चाहिये।।५४।।

ततः शापाभिभूतेन साम्बो नाराध्य भास्करम्।
पुनः सम्प्राप्य तद्रूपं स्वनाम्नार्को निवेशितः ॥५५॥
नारदो दर्शयित्वा तु स्त्रीणां भावविपर्ययम्।
साम्बं शापेन संयोज्य तत्रैवान्तरधीयत ॥५६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साम्बशापो नाम तृतीयोऽध्यायः

तदनन्तर अभिशप्त साम्ब ने भास्कर की आराधना से पुनः अपना रूप प्राप्त किया और अपने नाम से सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) किया। इधर नारद भी स्त्रीगण के भावविपर्यय को दिखलाकर तथा साम्ब को शाप दिलवाकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।।५४-५६।।

श्री साम्बपुराण का साम्बशाप नामक तृतीय अध्याय समाप्त