साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in contextचतुर्थोऽध्याय ९९
भानोर्या सप्तमी मूर्त्तिर्नाम्ना भग इति श्रुता।
भूमौ व्यवस्थिता सा तु शरीरेषु च देहिनाम्॥१४॥
सूर्य की सप्तम मूर्त्ति का नाम है—भग। यह भूमि में स्थित होकर सभी देहधारियों के शरीर में स्थित है॥१४॥
मूर्त्तिर्या चाष्टमी वास्य विवस्वानिति विश्रुता।
अग्नौ व्यवस्थिता सा तु पचत्यन्नं शरीरिणाम्॥१५॥
अष्टम मूर्त्ति विवस्वान् कहलाती है। यह अग्नि में स्थित होकर शरीरधारियों का अन्नपाक करती है॥१५॥
नवमी मित्रभानोर्या मूर्त्तिविष्णुश्च नामतः।
प्रादुर्भवति सा नित्यं देवानामरिसूडनी॥१६॥
सूर्य की नवम मूर्त्ति का नाम है—विष्णु। देवगण के शत्रुओं का नाश करने के लिये यह मूर्त्ति (विष्णु) नित्य प्रादुर्भूत होती है॥१६॥
दशमी तस्य या मूर्त्तिरंशुमानिति विश्रुता।
वायौ प्रतिष्ठिता सा तु प्रह्लादयति वै प्रजाः॥१७॥
इनकी दशम मूर्त्ति को अंशुमान कहा गया है। यह वायु में प्रतिष्ठित होकर सभी प्रजावर्ग का आनन्दवर्धन करती है॥१७॥
मूर्त्तिस्त्वेकादशी या तु भानोर्वरुणसंज्ञिता।
सा जीवयति वै कृत्स्नं जगदप्सु प्रतिष्ठितम्॥१८॥
इनकी एकादश मूर्त्ति 'वरुण' कहलाती है। यह जल में प्रतिष्ठित होकर जगत् को जीवनदान देती है॥१८॥
अपां स्थानं समुद्रस्तु वरुणोऽप्सु प्रतिष्ठितः।
तस्माद्वै प्रोच्यते नाम्ना सागरो वरुणालयः॥१९॥
जल का स्थान है—समुद्र। वरुण जल में प्रतिष्ठित होकर समस्त जगत् को जीवनदान देते हैं। तभी तो सागर को वरुणालय कहा गया है॥१९॥
मूर्त्तिर्या द्वादशी भानोर्नामितो मित्रसंज्ञिता।
लोकानां सा हितार्थाय स्थिता चन्द्रसरित्तटे॥२०॥
सूर्य की बारहवीं मूर्त्ति का नाम है—मित्र। यह लोकालय का हित चाहती है, तभी तो चन्द्रभागा नदी के तट पर अवस्थित है॥२०॥
वायुभक्षस्तपस्तेपे स्थितो मैत्रेण चक्षुषा॥२१॥