साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in context२२ श्रीसाम्बपुराणम्
योऽक्षयश्चाव्ययश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः।
धृतं चैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥७॥
यः पिता सर्वदेवानां दैवतं चापि यः परम्।
यजते देवतां कास्तु पितॄन् कान् यजते च सः ॥८॥
जो अक्षय, अव्यय, प्रकट-अप्रकट, सनातन हैं; जिनके एक रूप से यह त्रिभुवन धृत है, जो सभी देवताओं के पिता तथा परम देवता हैं, वे स्वयं किस देवता का यजन कर रहे हैं? किस पितृगण का पूजन कर रहे हैं॥७-८॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा तं देवं नारदोऽब्रवीत्।
वेदेषु च पुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु गीयते ॥९॥
नारद मन ही मन ऐसा चिन्तन करके मित्र से पूछने लगे—साङ्गोपाङ्ग वेद तथा पुराणों में कहा गया है कि॥९॥
नारद उवाच
त्वमजः शाश्वतो धाता महाभूतमनुत्तमः।
भूतं भव्यं भविष्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥१०॥
आप ही शाश्वत, अज, धाता (सृष्टिकर्त्ता-धारणकर्त्ता) अनुत्तम महाभूत हैं। भूत-भविष्य-वर्त्तमान सब आपके अन्दर प्रतिष्ठित है॥१०॥
चत्वारो ह्याश्रमा देव गृहस्थाद्यास्तथैव च।
यजन्ते त्वामहरहः नानामूर्त्तिसमाश्रितम् ॥११॥
पिता माता च सर्वस्य दैवतं त्वं हि शाश्वतम्।
यजसे पितरं कं त्वं देवं चापि न वेद्यहम् ॥१२॥
हे देव! गृहस्थ प्रभृति चारो आश्रम दिन-रात नाना मूर्तियों में विद्यमान आपकी पूजा करते रहते हैं। आप ही सभी के पिता, माता तथा नित्य देवता हैं। आप किस पिता अथवा देवता का यजन कर रहे हैं, यह मैं नहीं जानता॥११-१२॥
मित्र उवाच
अवाच्यमेतद् वक्तव्यं परं गुह्यं सनातनम्।
त्वयि भक्तिमति ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥१३॥
मित्र कहते हैं—यह अकथनीय कथा है, परम गोपनीय है। हे ब्रह्मन्! तुझ भक्तिमान से मैं वह यथायथ रूपेण बतलाता हूँ॥१३॥
यत्तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम् ॥१४॥