BharatKosha
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)

Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)

DevanagariHindipublished424 pages

Page 34 of 424

Read in context
Page 34

२४ श्रीसाम्बपुराणम्

समस्त इन्द्रियों के गुणाश्रय वे सकल इन्द्रियरूप हैं। जैसे एक ही दीपक से हजारों दीपक प्रज्वलित होते हैं, वैसे ही वे अकेले ही बहुरूपेण प्रकाशित हो रहे हैं। जब उन्हें जाना जाता है, तब वे केवल आत्मरूपेण अवस्थान करते हैं। प्रलय में इनका एक-रूपत्व रहता है एवं सृष्टिकाल में इनका बहुरूपत्व हो जाता है। यह एक एवं नित्यस्वरूप हैं। इन एक ईश्वर के अतिरिक्त इस जगत् में कोई भी स्थावर-जंगम प्राणी नित्य नहीं है॥२१-२३॥

अक्षयश्चाप्रमेयश्च सर्वगश्च स उच्यते।
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम॥२४॥

वे अक्षय, अप्रमेय (अतुलनीय), सर्वग (सर्वत्र गमनशील) एवं अव्यक्त हैं। हे द्विजोत्तम! उनसे ही त्रिगुण उत्पन्न हुआ है॥२४॥

अव्यक्तव्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरुच्यते।
तां योनिं ब्रह्मणो विद्धि नित्यं योऽसौ मदात्मकः॥२५॥

जो अव्यक्त तथा व्यक्तभावरूप हैं, उन्हें प्रकृति कहा गया है। वह ब्रह्मयोनि (प्रकाश स्थान) है। वह नित्य तथा मेरा ही स्वरूप है॥२५॥

लोके च पूज्यते योऽसौ दैवे पित्र्ये च कर्मणि।
नास्ति तस्मात्परो ह्यन्यः पिता देवोऽपि सात्त्विकः॥२६॥

जगत् में वे दैव तथा पितृकर्म में पूजित होते हैं, उनकी अपेक्षा अन्य कोई पिता अथवा सात्त्विक देवता नहीं है॥२६॥

आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयाम्यहम्।
स्वर्गस्था अपि ये केचित्तं नमस्यन्ति देहिनः॥२७॥
ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनोद्दिष्टफलाद् गतिम्।
तं देवाश्चाश्रमस्थाश्च नानामूर्तिसमाश्रिताः॥२८॥
भक्त्या सम्पूजयन्त्याद्यगतिं चैषां ददाति सः।
स हि सर्वगतश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते॥२९॥

वे हमारी आत्मारूप से विज्ञेय हैं, अतएव मैं उनकी पूजा करता हूँ। स्वर्गस्थ कोई-कोई देहधारी उनको नमस्कार करते हैं। वे उनकी कृपा से उनके द्वारा प्रदत्त गति प्राप्त करते हैं। नाना मूर्तियुक्त देवता तथा आश्रमस्थ साधकादि जो उनकी अर्चना करते हैं, भक्तियुक्त पूजनादि करते हैं, वे उन्हें उत्तमा गति प्रदान कर देते हैं। वे सर्वत्र, सर्व प्राणीगण में गमनशील तथा निर्गुण कहे जाते हैं॥२७-२९॥

एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयामि सनातनम्।
ये तु तद्भाविता लोका एकत्वञ्च समाश्रिताः॥३०॥