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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)

Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)

DevanagariHindipublished424 pages

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६० श्रीसाम्बपुराणम्

सन्तुष्टस्तस्य तद्वाक्यं बहु मेने महातपाः।
अनुज्ञातस्ततस्त्वष्टा रूपनिर्वर्त्तनस्य तु॥४०॥

हे देव! मेरे समान ब्राह्मण का वाक्य यदि आपको रुचिकर लगे, तब हे अरिन्दम! आपके इस रूप को मैं कमनीय बना दूँ। सूर्य का रूप तब तिर्यक्, ऊर्ध्व, अधः, सम था। उस रूप से सूर्यदेव स्वयं पीड़ित थे। सन्तुष्ट होकर महातपा सूर्य ने उनके वाक्य का सम्मान किया और रूप-परिवर्त्तनार्थ त्वष्टा (विश्वकर्मा) को अनुमति प्रदान किया॥३८-४०॥

विश्वकर्माभ्यनुज्ञातः शकद्वीपे विवस्वतः।
भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शान्तयमास तस्य वै॥४१॥
आज्ञया लिखितश्चासौ निपुणं विश्वकर्मणा।
नाभ्यनन्दत्तल्लिखनं ततस्तेनावतारितः॥४२॥
तत्तु निष्पादितं रूपं तेजसापहृतेन तु।
कान्तात् कान्तरं भूत्वा ह्यधिकं शुशुभे ततः॥४३॥

विश्वकर्मा ने अनुज्ञात होकर शकद्वीप में चक्र का आरोपण करके सूर्य के उस तेज को संयत किया। आदेश पाकर विश्वकर्मा ने निपुणता से रेखा बनाया; किन्तु उस अङ्कन को सूर्य ने पसन्द नहीं किया। तब उन्होंने वहाँ से उतर कर तेज का अपहार करके (तेज-संवरण करके) अपना रूप निष्पन्न किया। तदनन्तर सुन्दर से सुन्दर रूप में इनकी आकृति शोभित हो गयी॥४१-४३॥

ददर्श योगमास्थाय स्वां भार्यां बड़वां तदा।
अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा स्वेन संवृताम्॥४४॥
अश्वरूपेण मार्तण्डस्तां मुखे समभावयत्।
मैथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसो विशङ्कया॥४५॥
सा तद्विवस्वतः शुक्रं नासिकाभ्यां निरावमत्।
देवौ तस्यामजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ॥४६॥

तब सूर्यदेव ने अपने योगबल से अपने तेज को संवृत करके सकल प्राणियों द्वारा अधृष्य घोड़ी रूप से वर्तमान अपनी भार्या को देखा। तब मार्त्तण्ड ने भी अश्वरूप धारण करके उनसे मुख मिलाया। परपुरुष से मैथुन असंगत जानकर संज्ञा ने सूर्य के शुक्र को अपनी नासिका से बाहर निकाल दिया, जिससे चिकित्सकश्रेष्ठ अश्विनीकुमार उत्पन्न हुये॥४४-४६॥

नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ तौ नामतोऽश्विनौ।
ततः कान्तं स्वकं रूपं दर्शयामास भास्करः॥४७॥