साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in contextषोडशोऽध्यायः
(सूर्यस्य परिवारवर्णनम्)
नारद उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि दण्डनायकपिङ्गलौ।
राज्ञस्तोषौ तथा चान्यान् पार्श्वस्थान् दिण्डिना सह ॥१॥
नारद कहते हैं—इसके अनन्तर दण्डनायक पिङ्गल, राज्ञ, स्तोष एवं दण्डि के साथ अन्य पार्श्वचरों की कथा कहता हूँ॥१॥
ब्रह्मणा सह संगम्य पुरा देवैर्विचारितम्।
एष कारुणिकः सूर्यो दैत्येभ्यो दास्यते वरान् ॥२॥
ते तु लब्धवरा भूत्वा बाधन्ते दिवौकसः।
तस्मात्तेषां विघातार्थमेधामः प्रणता वयम् ॥३॥
पुराकाल में एक समय देवगण ब्रह्मा के साथ बैठकर सोच रहे थे कि एकमात्र कारुणिक सूर्य दैत्यों को वर देते हैं और उनसे वर प्राप्त करके स्वर्ग में रहने वाले देवताओं को वे दैत्यगण पीड़ित करते हैं। अतएव उनको प्रतिहत करने के लिये हमको सूर्यदेव के समक्ष प्रणत होना चाहिये॥२-३॥
अस्माभिः प्रतिरुद्धास्ते न द्रक्ष्यन्ति दिवाकरम्।
सम्मन्त्र्यैवं ततस्त्विन्द्रो वामपार्श्वे रवेः स्थितः ॥४॥
दण्डनायकसंज्ञस्तु सर्वलोकस्य स प्रभुः।
उक्तश्च स तदार्केण त्वं प्रजा दण्डनायकः ॥५॥
दण्डनीतिकरो यस्मात्तस्मात्त्वं दण्डनायकः।
लिखते यः प्रजानां तु सुकृतं यच्च दुष्कृतम् ॥६॥
हमारे द्वारा प्रतिरुद्ध होकर वे (असुर) दिवाकर सूर्य को नहीं देख पायेंगे। इस प्रकार मन्त्रणा करके इन्द्र ने रवि के वाम पार्श्व में अवस्थान किया। दण्डनायक नाम से प्रसिद्ध वे सभी लोकों के प्रभु हैं। उनसे सूर्यदेव ने कहा—तुम प्रजागण के दण्ड का विधान करो। दण्डनीति का विधान करने के लिये तुम दण्डनायक कहलाओगे तथा तुम प्रजा के सुकृत या दुष्कृत को लिखोगे॥४-६॥
अग्निर्दक्षिणपार्श्वे तु पिङ्गलत्वात् स पिङ्गलः।
अश्विनौ चापि सूर्यस्य पार्श्वयोरुभयोः स्थितौ।
अश्वरूपात् समुत्पन्नौ तेन तावश्विनौ स्मृतौ ॥७॥