संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextयोनिरोग ।
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निकलनेपर तुरंत चैन पड़ जावे। रज ऊपर जानेसे इसे उदावर्तिनी योनि कहते हैं।
(१६) अंतर्मुखी योनि—उसको कहते हैं जब खूब भोजन करनेके पीछे स्त्री उलटे और टेढ़े इत्यादि होकर संयोग करे तो अन्दरकी वायु योनिमें आकर योनि मुखको देहा कर देती है। इससे मांस और हड्डियाँमें पीड़ा होती है। ऐसे समयमें स्त्रीके साथ मैथुन नहीं किया जा सकता।
(१७) सूचीमुखी योनि—उसको कहते हैं किमाताके दोषके कारण वायु सूखापन लेकर गर्भकी कन्याके योनिको दूषित करके योनिस्त्राको छोटा कर देती है।
(१८) शुष्का योनि—उसको कहते हैं कि मैथुन समयमें जब स्त्री पाखाना और पेशाबके वेगोंको रोक लेती है तो उसके मल और मूत्रके रुकनेसे योनि सूखी हो जाती है।
(१९) वामिनी योनि—उसको कहते हैं कि गर्भाशयमें पहुँचा हुआ वीर्य दृढ़के साथ या बिना दृढ़के ही छू या सात दिनके अन्दर गर्भाशयसे निकल जाता है।
(२०) पण्डी—उसको कहते हैं कि जिसके जीज-दोषके कारण गर्भस्थ कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जावे। उसको पुष्प-समागमकी इच्छा नहीं होती और न छाती निकलती है। ऐसी स्त्री हिजड़ी होती है। इसका इलाज नहीं हो सकता।
(२१) महा योनि—उसको कहते हैं कि दुःख पहुँचानेवाली दूदी चारपाई पर सोकर उलटी रीतिसे संयोग करनेपर वायु बिगड़ कर गर्भाशय और योनि मुखको रोक देती है। इससे योनि अस्वच्छमुखा, दूरयुक्त रूखा और भाग दार रज निकलनेवाली होती है और योनिमुखका मांस उंचा