BharatKosha
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

Page 111 of 302

Read in context
Page 111

६०

सन्तति-शास्त्र ।

इस प्रकार अनेक रोगोंसे योनि दूषित हो जाती है और फिर वह वीर्य ग्रहण नहीं करती। अतएव सन्तानका होना कठिन हो जाता है। रोगके प्रारम्भमें अनेक प्रकारके सन्देशों से कुछ परवाह नहीं की जाती। परिणाम यह होता है कि रोग अच्छी तरह बढ़ जाता है और फिर बड़ी कठिनाई पड़ती है। अतएव रोग प्रारम्भ होते ही यल करना चाहिये।

( १८ ) मूत्ररोग ।

यह बहुत बड़ा रोग है। मल और मूत्रकी पराचीसे शरीर नाश हो जाता है। इनसे अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होकर बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ उपस्थित करते हैं। जब मूत्ररोग हो तो योनि गर्भाशय और मसानेके रोगोंपर अवश्य विचार करना चाहिये। इसके कारण और भी हैं, परन्तु बहुधा इन्हींसे यह रोग होता है। इसके अनेक भेद हैं।

१. मूत्रके मार्ग (रास्ते) की जलान ।

इसके अनेक कारण हैं ।

(रति-शास्त्र।

१. गुर्देकी खुजली, योनिमार्गमें शोथ और घाव ।

२. रज कष्टसे आना और गर्मी सूजाके विकारसे ।

३. योनिके भीतरी घाव और रजविकारसे ।

४. शरीरमें पित्तकी अधिकता और मसानेकी खुजलीसे ।

५. गुर्दे, मसानेके घाव और पाक होनेसे ।

६. मूत्रमार्गकी नलीकी सूजन और गर्भाशयके मुखाके घावोंसे ।

७. प्रदर और कुसमयमें रज निकलनेसे ।

८. कलेजकी गर्मी और गर्भाशयके टल जानेसे ।