संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
और भागदार निकलता है। पीड़ा कम होती है। कै, अस्त्रि, स्वांस्तरोग और खांसी होती है।
( च० चि० अ० ३० श्लो० १४२ )
४ मन्निपातिक प्रवर—इसका निम्न कारण है।
१. वात, पित्त और कफ्फे जो कारण उपर कहे गए हैं वे सब इसमें होते हैं। ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४३ )
२. वात, पित्त और कफ्फे जो कारण उपर कहे गए हैं वे सब इसमें होते हैं। ( च० चि० अ० ३० श्लो० १४४ )
यह रोग अच्छा हो सकता है, परन्तु जिसे वरावर रक्त निकला करे, प्यास दह और ज्वर हो, रक्तके अधिक निकलने से स्त्री दुर्बल हो जाय, जिसका बहुतसा रक्त निकलगया हो, ऐसी स्त्रीका प्रवर अच्छा नहीं होता। अतएव औषधि करना न्यर्थ है। ( चर्क )
प्रवर दो प्रकार का होता है। रक्त प्रवर और श्वेत प्रवर। रक्त प्रवरमें रक्त निकलता है। श्वेत प्रवरमें चिकना श्रयवा पानी सरीखा सफेद रंगका स्नाव होता रहता है।
२. डाकट्टोंका भत ।
इस भतमें भी दो प्रकारके प्रवर माने गए हैं। एक वह कि जिसमें केवल पानी सरीखा सफेद रंगका स्नाव होता है; दूसरा वह कि जिसमें कुछ लासी लिये पतला या गाढा स्नाव होता है। यह दो स्थानोंसे होता है—यौनि और गर्भाशयसे। इसलिये कोई इसको यौनि प्रवर और कोई गर्भाशयका प्रवर कहते हैं। इन दोनोंके अनेक कारण हैं।
१. यौनि और गर्भाशयका शोथ ।
२. गर्भाशयका मस्सा और गर्भ-स्नाव हो जाना ।