संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 148 of 302
Read in contextगर्भाधानका समय ।
१२७
२. रजवती के साथ पहले दिन गमन करने से पुरुषको कुछ रोग होनेका भय रहता है। यदि गर्भ रह जाय, तो बालक गर्भमें या पैदा होते ही मर जाता है। ( १० क० )
२. दूसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वला होनेके दूसरे दिन संयोग करने से पुरुष की उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो जन्म लेने ही वा सौरीहीमें बालक १० दिनमें मर जाता है।
( सु० १० अ० ३ अ० ३३ )
२ दूसरे दिन गमन करने से उपदंश ( गरमी ) और रक्त विकार हो जाता है और स्त्रियों को गर्भाशय के रोग हो जाते हैं। ( १० क० )
३. तीसरी रात्रि—वैद्यका मत।
१. रजस्वलाके साथ तीसरे दिन संयोग करने से पुरुषकी उमर कम होती है। यदि गर्भ रह जाय तो अधूरे अंगकी और थोडे दिन जीनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है।
( सु० १० अ० ११ अ० ३२ )
२. तीसरे दिन गमन करने से पुरुषके आँखों की रोशनी जाती रहती है और गर्भ रह जाने पर बालक अंगहीन उत्पन्न होता है। ( १० क० )
४. चौथी रात्रि—वैद्यका मत
१. रजस्वला के चौथे दिन गमन करनेसे बालक सब अंगों से पूर्ण बहुत दिनोंतक जीनेवाला होता है।
( सु० १० अ० २१ अ० ३२ )
२. चौथे दिन गर्भमें आया हुआ बालक उत्तम और वीर्यायु होता है, परन्तु इस दिनके संयोगसे गर्भाशय को हानि पहुँचती है। ( १० क० )