संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextकन्या या पुत्र उत्पन्न करत्वा मनुष्यके अधीन है। १३७
कि—“आपके दरबार में अनेक विद्वानोंके रहते हुएभी यह निश्चय नहीं हुआ कि कन्या और पुत्रका गर्भ कैसे बनता है।” उस समय महाराज चुप रहे। दूसरे दिन दरबारमें महाराजने प्रश्न किया कि—“मातापिताका रजवीर्य ही कन्या और पुत्र उत्पन्न होनेका कारण है, इसलिये एक माता पिताके रजवीर्यसे कभी कन्या और कभी पुत्र उत्पन्न होनेका कारण क्या है ?” सभामें अनेक विद्वान थे, उनमेंसे राज्यवैद्यने कहा—“राजन स्त्री और पुरुष अपने अपने प्रधान अङ्गसे कन्या और पुत्र उत्पन्न करने हैं। पुरुषका प्रधान दाहिना और स्त्री का प्रधान वार्ष अङ्ग है। जब पुरुषके दाहिने अङ्गसे निकला हुआ वीर्य स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकले रजसे मिलता है, तो पुत्र और जब पुरुषके वार्ष अंगसे निकला वीर्य स्त्रीके वार्ष अंगसे निकले हुए रजके साथ मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है। (भो० जी० च० दुर्गादत्त ० लि०)
५. वौद्ध लोगोंका मत।
१. कन्या और पुत्रका होना माता पिता के सबल और निर्बल रजवीर्यपर निर्भर है।
६. यूनानीमत।
१. वीर्यके प्रबल होनेसे पुत्र और रजके प्रबल होनेसे कन्या होती है।
२. स्त्रीपुरुषके दाहिने अंग के अवयवसे पुत्र और वार्षसे कन्या उत्पन्न होती है। (अस्तू)
७. युरोपीय विद्वानोंकी राय
१. प्रोफेसर मोन्सथ्यूरीकी राय है कि रजोदर्शनसे चौथे