संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 181 of 302
Read in context१६०
सन्तति शास्त्र ।
चलकर प्रेम कैसा होगा ? बहुतेरे इस बातको नहीं मानते कि जन्मपत्रीसे इस बातका पता क्या लगेगा कि स्त्री पुरुषमें प्रेम होगा या नहीं। यह एक मिथ्या बात है। जिन स्त्री पुरुषोंकी यह मैत्री और गण मैत्री ठीक है, चाहे उनमेंसे एक कुरूप ही क्यों न हो, वे दोनों अवश्य परस्पर प्रेमी होंगे। परन्तु वह स्त्री पुरुष कि जिनकी यहमैत्री और गण मैत्री ठीक नहीं हैं, दोनोंके सुन्दर और लावण्यता पूर्ण होते हुए भी प्रेम नहीं रहता। पहले हिन्दुओंमें स्वयंवरकी प्रथा थी। इसका भी यही मत-लव था कि कन्याका प्रेम जिसपर हो वही उसका पति हो। यूरोपमें कन्याएं स्वयं अपना पति ढूँढ़ लेती हैं। इससे भी यही तात्पर्य है कि जिससे प्रेम हो वही पतित्वमें वरण किया जाय। गर्भाधान समयका मन्द प्यार बालकोंकी मांस रज्जुको शिथिल बना देता है। उत्साहयुक्त प्यारसे अवयव दह और मनके तन्तु सतेज बनते हैं। जिस प्रकार संयोग समयमें प्रेम द्वारा माता पिताका हर्ष बढ़ता है उसी प्रकार सन्तान सुन्दर, सुडौल और उत्तम होती है। यदि संयोग-समयमें मातापिताका हर्ष पूर्ण प्रकाश नहीं पाता तो मध्यम गुणोंवाली सन्तान होती है। यदि हर्षका प्रकाश विलकुल न हुआ, तो अनेक प्रकारकी कुरूप और अंगहीन सन्तान उत्पन्न होती है।
प्रेम इस बातको नहीं चाहता कि स्त्री या पुरुष सुन्दर हों। प्रेम तो बदलेमें केवल प्रेम ही चाहता है। प्रायः देखा गया है कि रूपवती स्त्री और कुरूप पुरुष या कुरूप स्त्री और सर्वोत्तम सुन्दर पतिमें प्रेमकी धारा वेगसे बहती है। स्त्री और पुरुषके प्रेमकी, कि जिसका प्रभाव सन्तानपर पड़ता है, अनेक बार परीक्षा की जा चुकी है और इनमें प्रेमकी सत्यताकी भलक-दिललाई भी पड़ती है।