संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति शास्त्र ।
इच्छाशक्ति और मनो-बल कहते हैं। यही सबका सर्वस्व है और यही सर्वप्रधान वस्तु है। मनकी शक्ति दो तरहकी होती है। एक प्रत्यक्ष, दूसरी छिपी हुई। सन्तान पैदा करनेमें कैसी मनकी शक्तिका प्रयोग होता है, इस विषयमें विद्वानोंका मत है कि 'इसमें छिपी हुई मनकी ताकत काममें आती है।' माता-पिताके मनकी ताकतके अनुसार शरीर और उसके सारे अवयव तथा मनकी वृत्ति बनती है। सन्तानके रूप रंगमें, शरीरके बननेमें और स्वास्थ्यमें, विचारोंकी बनावट और विगाड़का कारण केवल मनकी ताकत ही है। जिस तरह यदि आदमी गुस्सेमें आकर तसवीर खिंचवाता है, तो उसकी तसवीर क्रोधभरी जान पड़ती है, इसी प्रकार हँसते गाते, क्रूढ़ते और उछलते हुए मनुष्यकी तसवीर उसी प्रकारकी होती है। इसी तरह मनकी शक्ति, जोगमाधानके समय होती है या जिसका संचार गभावसामें हुआ करता है, उसीके अनुसार अच्छी आकृति, प्रकृति और स्वभाव इत्यादि बनते हैं।
मनकी शक्तिमें सब शक्तियाँ आ जाती हैं, जिनका सवन्ध मनसे है। मनकी शक्तिका काम रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है और बच्चे के दूध पीनेके समय तक विशेष रीति से रहता है यही समय माता पिता द्वारा बच्चेके उत्तम वा मध्यम बननेका होता है। इसके अनेक प्रमाण हैं।
१. रजोदर्शनके समय मनोबलका प्रभाव ।
१. मनकी शक्तिमें विकार न उत्पन्न होनेके लिये ही रजोवती-को एकान्तवास कहा गया है। इस विषयमें वैद्यका मत है कि काल करके चौथे दिन स्त्रीको पति आगच्छ