संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextबच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।
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इस बात को नहीं मानते, परन्तु इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यदि शेरनी का दूध बच्चेको पिला दिया जाय, तो बच्चा अत्यन्त क्रोधी हो जायगा, परन्तु गाय का दूध पिलानेसे बच्चा क्रोधी नहीं होता, कारण यह है कि शेरनीकी प्रकृति ऐसी है कि वह हर समय क्रोधमें रहती है और क्रोधका असर दूध में रहता है। अतएव यह मानना पड़ेगा कि माताके अच्छे बुरे गुणोंका असर दूधमें अवश्य रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि—
१. जो बच्चे धायाँके यहाँ पाले जाते हैं, जवानी और बुढ़ापे तक चाहे वे कैसेही क्यों न हो जायँ, परन्तु उनमें धायाँके गुण दोष अवश्य आ जाते हैं।
२. बंगालमें एक प्रतिष्ठितके घर सन् १८६५ ई० में एक बालक उत्पन्न हुआ। माता चार दिन बाद मर गई। एक अहीरिनने उसे पाला। इसके यहाँ सब चोरी किया करते थे। तीन वर्षतक बालकने इसका दूध पिया। इसके बाद लड़का पिताके घर रहने लगा। पिताजी सीधे सादे थे, परन्तु बालक बड़ा होनेपर चोरोंके समुदाय का सरदार बना।
मानसशास्त्रके विद्वानोंका यह सिद्धान्त बहुत ठीक है कि संसारमें जो कुछ होता है वह मनःशक्तिके प्रभावसे। यही कारण है कि एक माता से उत्पन्न हुए बालकोंकी सूरत और प्रकृति दूसरेसे नहीं मिलती। एक भाई पापी है, तो दूसरा धर्मात्मा, एक कुरूप तो दूसरा रूपवान। इन सब का कारण मनःशक्ति हैं इसलिये सन्तानके सुधारनेके लिये माता पिताको अपने मनकी शक्ति ठीक रखनी चाहिये।