संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextमातापिताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव । १७३
होता है गर्भके वक्षेको वैसा ही बनना पड़ता है; क्योंकि वृत्तके आत्मा मातापिताकी आत्मापर अवलंबित है । अतएव कुव्यवहारके कारण अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है ।
१. जो पुरुष मोहवश ऋतु समयमें स्त्रीके नीचे होकर संयोग करता है, यदि उस समय गर्भ रह जावे और पुत्र हो तो वह स्त्री, चेष्टावाला, जनानियों, जनखा उत्पन्न होता है । इसको षण्ड कहते हैं ।
( सु० १० अ० २ श्लो० ४६ )
२. ऋतुसमयमें वलवती स्त्री पुरुषके ऊपर चढ़ कर संयोग करावे और गर्भ रह जावे और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह कन्या दाढ़ी मूर्छवाली तथा पुरुषके समान चेष्टावाली होती है । ( सु० १० अ० २ श्लो० ४७ )
३. संयोगकी इच्छा रखनेवाली दो स्त्रियाँ यदि आपसमें पुरुषकी भाँति संयोग करे और एक स्त्रीका वीर्य गिर जावे और दूसरी स्त्रीके रजसे वह वीर्य मिल जाय, तो चिना हृद्विडयावाली पिंड सरीषी सन्तान उत्पन्न होती है
( सु० १० अ० २ श्लो० ५१ )
यहाँपर यह शंका होती है कि क्या स्त्रियोंको वीर्य होता है ? यह मानी हुई बात है कि स्त्रियोंमें वीर्य होता है । यदि ऐसा न हो तो उनमें श्रोत्र नहीं हो सकता । जब श्रोत्र न होगा तो लावण्यता और सुकुमारता इत्यादि नहीं हो सकती । अतएव उनमें वीर्य अवश्य होता है । उपर्युक्त गर्भ उस स्त्रीको रहता है जो संयोगके समय नीचे रहती है । ( १० क० )
४. दूसरे पुरुषके संयोगसे निर्ललज सन्तान उत्पन्न होती है ।
( १० क० )