संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सूत्रति-शास्त्र ।
बुरा प्रभाव पड़ता है । इसके अनेक भेद हैं, जो रजस्वला होने से गर्भ उत्पन्न होनेतक होते हैं ।
१. दिनमें सोनेसे बहुत सोनेवाली, कज्जल लगानेसे अर्धी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान और अनुलेपन करनेसे दुःखशील, तेल लगानेसे कुष्ठी, नाखून कतरनेसे खराब नाखूनवाली, दौड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों तथा काले होठ, तालू और जीभवाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, जीरका शब्द सुननेसे वहिरी, वालों में कंठी करनेसे गंजी, हवा अधिक खानेसे तथा कष्ट करनेसे भतवाली सन्तान उत्पन्न होती है । जब ये आन्वरण रजस्वला समयमें किये जावें और उसी ऋतु धर्मसे गर्भ रह जावे, तो उसका बहुत बुरा प्रभाव सन्तान पर होता है । (च० श० अ० २ श्ल० २३)
२ यदि गर्भवती अंगोंको फैलाकर सोचे और रात्रिमें फिरा करे तो उन्मत्त सन्तान होती है ।
(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)
३ यदि कलह और लड़ाई करना गर्भवतीको अच्छा मालूम हो या करे तो भृंगी रोगवाली सन्तान होती है ।
(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)
४. यदि गर्भवती बहुत सोच विचार किया करे, तो डरनेवाली, क्षीण श्रयवा अल्पायु सन्तान होती है ।
(च० श० अ० ८ श्ल० ४६)
५. यदि गर्भवती चोरी किया करे, तो आलसी, भगड़ा करनेवाली और बुरे कामोंमें लगी रहनेवाली सन्तान होती है ।
(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)