संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 213 of 302
Read in context१६२
सन्तति-शास्त्र ।
पहचान यह है कि बालकके हृदयकी धड़कन घड़ीके समान टिक-टिकका शब्द बालकके हृदयपेणियोंके संकोचनसे होता है। इसके सुनाई पड़नेसे बालकका गर्भाणियमें होता निश्चय होता है। यह शब्द माताकी बाईं कोखके बीचमें सुन पड़ता है। इसकी चाल प्रायः एक मिनटमें १६० बारतक होती है। कन्याके गर्भमें अधिक और पुत्रमें कम होती है। जब ऐसा न हो, तो मृदुगर्भ समझना चाहिये। इस प्रकार परीक्षा करके सब्जे और मृदुगर्भका निश्चय करना कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त और कई प्रकारसे परीक्षा हो सकती है।
(४५) गर्भ रह जानेपर कवतक संयोग करना चाहिये ?
यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास कारण इसका यह है कि गर्भाधान हो जानेपर लोगोंको मालूम ही नहीं होता कि गर्भ रह गया है या नहीं। इसके अलावा स्वार्थवश विषय-वासनामें फँसकर लोग कुछ भी विचार नहीं करते। इस विषयमें अनेक मत देखे जाने हैं।
१. धर्मशास्त्रका मत ।
१ गर्भवतीके साथ दो मासतक भोग करना चाहिये ।
(त्रा० ४०)
२ गर्भवतीके साथ छ् मासतक मनुष्य विषय कर सकता है ।
(अत्रिस्तुति० १६३)
२. वैद्यकका मत ।
१. गर्भवतीके साथ दो मासतक संयोग करनेमें कोई हर्ज नहीं होता, यदि स्त्रीको कुछ रोग न हो। (१० क०)